भगवद्गीता · अध्याय 6 / 18
ध्यानयोग — ध्यान योग
47 श्लोक
अध्याय का सार
ध्यान की विधि: एकांत स्थान, स्थिर आसन, संयमित आहार और नींद, और मन को आत्मा में टिकाना। कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है, और चंचल मन अभ्यास और वैराग्य से वश में आता है।
सभी 47 श्लोक
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6.1 · श्रीकृष्ण
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ |
sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ ||श्रीभगवान बोले: जो कर्म के फल का सहारा लिए बिना अपना कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी — केवल अग्नि त्याग देने वाला या कर्म छोड़ देने वाला नहीं।
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6.2 · श्रीकृष्ण
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava |
na hyasaṃnyastasaṃkalpo yogī bhavati kaścana ||हे पाण्डव, जिसे संन्यास कहा जाता है, उसी को योग जानो; क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई योगी नहीं बनता।
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6.3 · श्रीकृष्ण
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ārurukṣormuneryogaṃ karma kāraṇamucyate |
yogārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇamucyate ||योग पर चढ़ना चाहने वाले मुनि के लिए कर्म को साधन कहा गया है; और जब वह योग पर आरूढ़ हो जाता है, तब उसके लिए शांति (शम) को साधन कहा गया है।
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6.4 · श्रीकृष्ण
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjate |
sarvasaṃkalpasaṃnyāsī yogārūḍhastadocyate ||जब मनुष्य न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है, न कर्मों में, और सब संकल्पों को त्याग देता है, तब वह योग पर आरूढ़ कहलाता है।
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6.5 · श्रीकृष्ण
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet |
ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ ||मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करे, अपने को नीचे न गिरने दे; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।
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6.6 · श्रीकृष्ण
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥bandhurātmātmanastasya yenātmaivātmanā jitaḥ |
anātmanastu śatrutve vartetātmaiva śatruvat ||जिसने अपने आप को जीत लिया है, वह स्वयं अपना मित्र है; पर जिसने अपने को नहीं जीता, उसका अपना ही मन शत्रु की तरह उससे शत्रुता करता है।
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6.7 · श्रीकृष्ण
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ ||जिसने अपने को जीत लिया है और जो शांत है, उसका अंतरात्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में भी परमात्मा में स्थिर रहता है।
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6.8 · श्रीकृष्ण
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ |
yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ ||जिसका मन ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो अविचल है, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान हैं, वह योगी योग में स्थित कहलाता है।
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6.9 · श्रीकृष्ण
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu |
sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate ||जो हितैषी, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष के पात्र और बन्धुओं में, तथा सज्जनों और पापियों में भी समान बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।
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6.10 · श्रीकृष्ण
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ |
ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ ||योगी एकांत में अकेला रहकर, मन और शरीर को वश में करके, आशा और संग्रह से मुक्त होकर, निरंतर अपने को योग में लगाए।
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6.11 · श्रीकृष्ण
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiramāsanamātmanaḥ |
nātyucchritaṃ nātinīcaṃ cailājinakuśottaram ||वह किसी शुद्ध स्थान पर अपने लिए स्थिर आसन बिछाए, जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, और जिस पर कुशा, मृगचर्म और वस्त्र एक के ऊपर एक बिछे हों।
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6.12 · श्रीकृष्ण
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ |
upaviśyāsane yuñjyādyogamātmaviśuddhaye ||उस आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
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6.13 · श्रीकृष्ण
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayannacalaṃ sthiraḥ |
samprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan ||शरीर, सिर और गर्दन को सीधा, अचल और स्थिर रखकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाकर और इधर-उधर न देखते हुए —
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6.14 · श्रीकृष्ण
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ |
manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ ||— शांत मन से, निर्भय होकर, ब्रह्मचर्य के व्रत में दृढ़ रहकर, मन को संयमित करके, चित्त को मुझमें लगाकर, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर योगयुक्त होकर बैठे।
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6.15 · श्रीकृष्ण
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī niyatamānasaḥ |
śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati ||इस प्रकार मन को वश में करके सदा अपने को योग में लगाता हुआ योगी उस शांति को पाता है जो मुझमें स्थित है और जिसकी परिणति निर्वाण है।
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6.16 · श्रीकृष्ण
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥nātyaśnatastu yogo’sti na caikāntamanaśnataḥ |
na cāti svapnaśīlasya jāgrato naiva cārjuna ||हे अर्जुन, योग न बहुत अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; न बहुत सोने वाले का, न सदा जागते रहने वाले का।
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6.17 · श्रीकृष्ण
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu |
yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā ||जिसका आहार और विहार संतुलित है, जिसकी कर्मों में चेष्टा संतुलित है, जिसका सोना और जागना संतुलित है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
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6.18 · श्रीकृष्ण
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥yadā viniyataṃ cittamātmanyevāvatiṣṭhate |
niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ityucyate tadā ||जब पूरी तरह वश में किया गया चित्त आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और मनुष्य सब कामनाओं की लालसा से मुक्त हो जाता है, तब वह योगयुक्त कहलाता है।
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6.19 · श्रीकृष्ण
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā |
yogino yatacittasya yuñjato yogamātmanaḥ ||जैसे बिना हवा वाले स्थान में रखा दीपक नहीं डगमगाता, वही उपमा उस योगी के लिए दी जाती है जिसका चित्त वश में है और जो आत्मा के योग में लगा है।
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6.20 · श्रीकृष्ण
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yogasevayā |
yatra caivātmanātmānaṃ paśyannātmani tuṣyati ||जब योग के अभ्यास से संयमित चित्त शांत हो जाता है, जब मनुष्य आत्मा से आत्मा को देखकर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है —
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6.21 · श्रीकृष्ण
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥sukhamātyantikaṃ yattad buddhigrāhyamatīndriyam |
vetti yatra na caivāyaṃ sthitaścalati tattvataḥ ||— जब वह उस परम सुख को जानता है जो इन्द्रियों से परे है और केवल बुद्धि से ग्रहण किया जाता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी नहीं डिगता —
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6.22 · श्रीकृष्ण
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃ manyate nādhikaṃ tataḥ |
yasminsthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate ||— जिसे पाकर वह किसी और लाभ को उससे बढ़कर नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता —
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6.23 · श्रीकृष्ण
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥taṃ vidyādduḥkhasaṃyogaviyogaṃ yogasaṃjñitam |
sa niścayena yoktavyo yogo’nirviṇṇacetasā ||— दुःख के संयोग से इस वियोग को ही योग नाम से जानना चाहिए। इस योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय और उत्साह भरे मन से करना चाहिए।
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6.24 · श्रीकृष्ण
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥saṃkalpaprabhavānkāmāṃstyaktvā sarvānaśeṣataḥ |
manasaivendriyagrāmaṃ viniyamya samantataḥ ||संकल्प से उठने वाली सब कामनाओं को पूरी तरह त्यागकर, मन से ही इन्द्रियों के समूह को सब ओर से रोककर —
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6.25 · श्रीकृष्ण
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥śanaiḥ śanairuparamedbuddhyā dhṛtigṛhītayā |
ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiṃcidapi cintayet ||— धीरे-धीरे, धैर्य से युक्त बुद्धि द्वारा शांति की ओर बढ़े; मन को आत्मा में स्थिर करके फिर और कुछ भी न सोचे।
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6.26 · श्रीकृष्ण
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥yato yato niścarati manaścañcalamasthiram |
tatastato niyamyaitadātmanyeva vaśaṃ nayet ||चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटककर जाए, वहाँ-वहाँ से उसे लौटाकर आत्मा के ही वश में लाए।
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6.27 · श्रीकृष्ण
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥praśāntamanasaṃ hyenaṃ yoginaṃ sukhamuttamam |
upaiti śāntarajasaṃ brahmabhūtamakalmaṣam ||जिसका मन पूरी तरह शांत है, जिसका रजोगुण थम गया है, जो पापरहित है और ब्रह्म से एक हो गया है, ऐसे योगी को परम सुख प्राप्त होता है।
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6.28 · श्रीकृष्ण
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ |
sukhena brahmasaṃsparśamatyantaṃ sukhamaśnute ||इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पाप से मुक्त योगी सहज ही ब्रह्म के संपर्क का अनंत सुख पाता है।
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6.29 · श्रीकृष्ण
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥sarvabhūtasthamātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani |
īkṣate yogayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ ||योग से युक्त और सर्वत्र समान दृष्टि रखने वाला व्यक्ति अपने आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को अपने आत्मा में देखता है।
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6.30 · श्रीकृष्ण
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati |
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati ||जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता, और न वह मेरे लिए ओझल होता है।
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6.31 · श्रीकृष्ण
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ |
sarvathā vartamāno’pi sa yogī mayi vartate ||जो एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में बसे मुझको भजता है, वह योगी चाहे जिस प्रकार भी रहे, मुझमें ही रहता है।
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6.32 · श्रीकृष्ण
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo’rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ ||हे अर्जुन, जो अपने समान ही सबको देखता है और सबके सुख-दुःख को अपने जैसा समझता है, वह योगी सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
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6.33 · अर्जुन
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥yo’yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana |
etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvātsthitiṃ sthirām ||अर्जुन बोले: हे मधुसूदन, आपने समता का जो यह योग बताया है, मन की चंचलता के कारण मुझे इसकी स्थायी स्थिति दिखाई नहीं देती।
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6.34 · अर्जुन
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavaddṛḍham |
tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyoriva suduṣkaram ||हे कृष्ण, मन बड़ा चंचल, उथल-पुथल मचाने वाला, बलवान और हठी है। मुझे इसे रोकना वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन लगता है।
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6.35 · श्रीकृष्ण
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam |
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ||श्रीभगवान बोले: हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और इसे वश में करना कठिन है; पर हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।
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6.36 · श्रीकृष्ण
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ |
vaśyātmanā tu yatatā śakyo’vāptumupāyataḥ ||मेरा मत है कि जिसका मन वश में नहीं, उसके लिए योग पाना कठिन है; पर जिसने मन को वश में कर लिया है और जो प्रयत्नशील है, वह सही उपाय से इसे पा सकता है।
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6.37 · अर्जुन
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ayatiḥ śraddhayopeto yogāccalitamānasaḥ |
aprāpya yogasaṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchati ||अर्जुन बोले: हे कृष्ण, जो श्रद्धा से युक्त है पर पूरा प्रयत्न नहीं कर पाता, जिसका मन योग से भटक जाता है, वह योग की सिद्धि न पाकर किस गति को प्राप्त होता है?
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6.38 · अर्जुन
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥kaccinnobhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati |
apratiṣṭho mahābāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi ||हे महाबाहो, क्या वह दोनों ओर से वंचित होकर, छितराए बादल की तरह नष्ट नहीं हो जाता — बिना सहारे का और ब्रह्म के मार्ग में भटका हुआ?
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6.39 · अर्जुन
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥etanme saṃśayaṃ kṛṣṇa chettumarhasyaśeṣataḥ |
tvadanyaḥ saṃśayasyāsya chettā na hyupapadyate ||हे कृष्ण, मेरे इस संशय को पूरी तरह आप ही दूर कर सकते हैं; आपके सिवा कोई और इस संशय को मिटाने वाला नहीं मिलता।
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6.40 · श्रीकृष्ण
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥pārtha naiveha nāmutra vināśastasya vidyate |
na hi kalyāṇakṛtkaściddurgatiṃ tāta gacchati ||श्रीभगवान बोले: हे पार्थ, ऐसे व्यक्ति का न इस लोक में नाश होता है, न परलोक में। हे तात, भलाई के काम करने वाला कोई भी व्यक्ति दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
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6.41 · श्रीकृष्ण
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥prāpya puṇyakṛtāṃ lokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ |
śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo’bhijāyate ||योग से भटका हुआ व्यक्ति पुण्य करने वालों के लोकों को पाकर वहाँ बहुत वर्षों तक रहता है, और फिर पवित्र और समृद्ध लोगों के घर जन्म लेता है।
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6.42 · श्रीकृष्ण
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥athavā yogināmeva kule bhavati dhīmatām |
etaddhi durlabhataraṃ loke janma yadīdṛśam ||या फिर वह बुद्धिमान योगियों के कुल में ही जन्म लेता है; पर ऐसा जन्म इस संसार में बहुत दुर्लभ है।
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6.43 · श्रीकृष्ण
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam |
yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana ||हे कुरुनन्दन, वहाँ उसे पिछले जन्म की बुद्धि के संस्कार फिर से मिल जाते हैं, और उनसे प्रेरित होकर वह सिद्धि के लिए पहले से भी अधिक प्रयत्न करता है।
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6.44 · श्रीकृष्ण
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo’pi saḥ |
jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate ||पिछले अभ्यास के कारण ही वह न चाहते हुए भी योग की ओर खिंच जाता है। योग को केवल जानने की इच्छा रखने वाला भी वेदों के कर्मकाण्ड से आगे निकल जाता है।
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6.45 · श्रीकृष्ण
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥prayatnādyatamānastu yogī saṃśuddhakilbiṣaḥ |
anekajanmasaṃsiddhastato yāti parāṃ gatim ||पर जो योगी लगन से प्रयत्न करता है, वह पापों से शुद्ध होकर, अनेक जन्मों में सिद्धि पाकर, अंत में परम गति को प्राप्त होता है।
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6.46 · श्रीकृष्ण
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥tapasvibhyo’dhiko yogī jñānibhyo’pi mato’dhikaḥ |
karmibhyaścādhiko yogī tasmādyogī bhavārjuna ||योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और कर्मकाण्ड करने वालों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो।
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6.47 · श्रीकृष्ण
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥yogināmapi sarveṣāṃ madgatenāntarātmanā |
śraddhāvān bhajate yo māṃ sa me yuktatamo mataḥ ||और सब योगियों में भी जो श्रद्धा के साथ, अपने अंतरात्मा को मुझमें लगाकर मुझे भजता है, उसे मैं सबसे अधिक युक्त मानता हूँ।