भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 22 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.22 · यं लब्ध्वा चापरं लाभं
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃ manyate nādhikaṃ tataḥ |
yasminsthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate ||
हिन्दी अनुवाद
— जिसे पाकर वह किसी और लाभ को उससे बढ़कर नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.22 का अर्थ क्या है?
— जिसे पाकर वह किसी और लाभ को उससे बढ़कर नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता —
भगवद्गीता 6.22 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।