भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 21 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.21 · सुखमात्यन्तिकं यत्तद्
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
sukhamātyantikaṃ yattad buddhigrāhyamatīndriyam |
vetti yatra na caivāyaṃ sthitaścalati tattvataḥ ||
हिन्दी अनुवाद
— जब वह उस परम सुख को जानता है जो इन्द्रियों से परे है और केवल बुद्धि से ग्रहण किया जाता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी नहीं डिगता —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.21 का अर्थ क्या है?
— जब वह उस परम सुख को जानता है जो इन्द्रियों से परे है और केवल बुद्धि से ग्रहण किया जाता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी नहीं डिगता —
भगवद्गीता 6.21 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।