भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 20 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.20 · यत्रोपरमते चित्तं

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥

yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yogasevayā |
yatra caivātmanātmānaṃ paśyannātmani tuṣyati ||

हिन्दी अनुवाद

जब योग के अभ्यास से संयमित चित्त शांत हो जाता है, जब मनुष्य आत्मा से आत्मा को देखकर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.20 का अर्थ क्या है?

जब योग के अभ्यास से संयमित चित्त शांत हो जाता है, जब मनुष्य आत्मा से आत्मा को देखकर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है —

भगवद्गीता 6.20 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।