भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 45 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.45 · प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥

prayatnādyatamānastu yogī saṃśuddhakilbiṣaḥ |
anekajanmasaṃsiddhastato yāti parāṃ gatim ||

हिन्दी अनुवाद

पर जो योगी लगन से प्रयत्न करता है, वह पापों से शुद्ध होकर, अनेक जन्मों में सिद्धि पाकर, अंत में परम गति को प्राप्त होता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.45 का अर्थ क्या है?

पर जो योगी लगन से प्रयत्न करता है, वह पापों से शुद्ध होकर, अनेक जन्मों में सिद्धि पाकर, अंत में परम गति को प्राप्त होता है।

भगवद्गीता 6.45 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।