भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.7 · जितात्मनः प्रशान्तस्य
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ ||
हिन्दी अनुवाद
जिसने अपने को जीत लिया है और जो शांत है, उसका अंतरात्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में भी परमात्मा में स्थिर रहता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.7 का अर्थ क्या है?
जिसने अपने को जीत लिया है और जो शांत है, उसका अंतरात्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में भी परमात्मा में स्थिर रहता है।
भगवद्गीता 6.7 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।