भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 18 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.18 · यदा विनियतं

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥

yadā viniyataṃ cittamātmanyevāvatiṣṭhate |
niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ityucyate tadā ||

हिन्दी अनुवाद

जब पूरी तरह वश में किया गया चित्त आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और मनुष्य सब कामनाओं की लालसा से मुक्त हो जाता है, तब वह योगयुक्त कहलाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.18 का अर्थ क्या है?

जब पूरी तरह वश में किया गया चित्त आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और मनुष्य सब कामनाओं की लालसा से मुक्त हो जाता है, तब वह योगयुक्त कहलाता है।

भगवद्गीता 6.18 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।