भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 36 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.36 · असंयतात्मना योगो इति मे

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥

asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ |
vaśyātmanā tu yatatā śakyo’vāptumupāyataḥ ||

हिन्दी अनुवाद

मेरा मत है कि जिसका मन वश में नहीं, उसके लिए योग पाना कठिन है; पर जिसने मन को वश में कर लिया है और जो प्रयत्नशील है, वह सही उपाय से इसे पा सकता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.36 का अर्थ क्या है?

मेरा मत है कि जिसका मन वश में नहीं, उसके लिए योग पाना कठिन है; पर जिसने मन को वश में कर लिया है और जो प्रयत्नशील है, वह सही उपाय से इसे पा सकता है।

भगवद्गीता 6.36 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।