भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 25 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.25 · शनैः धृतिगृहीतया

शनैः शनैरुपरमेद्‌बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥

śanaiḥ śanairuparamed‌buddhyā dhṛtigṛhītayā |
ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiṃcidapi cintayet ||

हिन्दी अनुवाद

— धीरे-धीरे, धैर्य से युक्त बुद्धि द्वारा शांति की ओर बढ़े; मन को आत्मा में स्थिर करके फिर और कुछ भी न सोचे।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.25 का अर्थ क्या है?

— धीरे-धीरे, धैर्य से युक्त बुद्धि द्वारा शांति की ओर बढ़े; मन को आत्मा में स्थिर करके फिर और कुछ भी न सोचे।

भगवद्गीता 6.25 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।