भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 26 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.26 · यतो यतो निश्चरति
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
yato yato niścarati manaścañcalamasthiram |
tatastato niyamyaitadātmanyeva vaśaṃ nayet ||
हिन्दी अनुवाद
चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटककर जाए, वहाँ-वहाँ से उसे लौटाकर आत्मा के ही वश में लाए।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.26 का अर्थ क्या है?
चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटककर जाए, वहाँ-वहाँ से उसे लौटाकर आत्मा के ही वश में लाए।
भगवद्गीता 6.26 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।