भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.4 · यदा हि नेन्द्रियार्थेषु
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjate |
sarvasaṃkalpasaṃnyāsī yogārūḍhastadocyate ||
हिन्दी अनुवाद
जब मनुष्य न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है, न कर्मों में, और सब संकल्पों को त्याग देता है, तब वह योग पर आरूढ़ कहलाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.4 का अर्थ क्या है?
जब मनुष्य न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है, न कर्मों में, और सब संकल्पों को त्याग देता है, तब वह योग पर आरूढ़ कहलाता है।
भगवद्गीता 6.4 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।