भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 43 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.43 · तत्र तं बुद्धिसंयोगं

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥

tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam |
yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana ||

हिन्दी अनुवाद

हे कुरुनन्दन, वहाँ उसे पिछले जन्म की बुद्धि के संस्कार फिर से मिल जाते हैं, और उनसे प्रेरित होकर वह सिद्धि के लिए पहले से भी अधिक प्रयत्न करता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.43 का अर्थ क्या है?

हे कुरुनन्दन, वहाँ उसे पिछले जन्म की बुद्धि के संस्कार फिर से मिल जाते हैं, और उनसे प्रेरित होकर वह सिद्धि के लिए पहले से भी अधिक प्रयत्न करता है।

भगवद्गीता 6.43 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।