भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 32 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.32 · आत्मौपम्येन सर्वत्र समं
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo’rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ ||
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन, जो अपने समान ही सबको देखता है और सबके सुख-दुःख को अपने जैसा समझता है, वह योगी सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.32 का अर्थ क्या है?
हे अर्जुन, जो अपने समान ही सबको देखता है और सबके सुख-दुःख को अपने जैसा समझता है, वह योगी सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
भगवद्गीता 6.32 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।