भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 10 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.10 · योगी युञ्जीत सततमात्मानं
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ |
ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
योगी एकांत में अकेला रहकर, मन और शरीर को वश में करके, आशा और संग्रह से मुक्त होकर, निरंतर अपने को योग में लगाए।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.10 का अर्थ क्या है?
योगी एकांत में अकेला रहकर, मन और शरीर को वश में करके, आशा और संग्रह से मुक्त होकर, निरंतर अपने को योग में लगाए।
भगवद्गीता 6.10 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।