भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.15 · युञ्जन्नेवं सदात्मानं
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī niyatamānasaḥ |
śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati ||
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार मन को वश में करके सदा अपने को योग में लगाता हुआ योगी उस शांति को पाता है जो मुझमें स्थित है और जिसकी परिणति निर्वाण है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.15 का अर्थ क्या है?
इस प्रकार मन को वश में करके सदा अपने को योग में लगाता हुआ योगी उस शांति को पाता है जो मुझमें स्थित है और जिसकी परिणति निर्वाण है।
भगवद्गीता 6.15 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।