भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 41 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.41 · प्राप्य पुण्यकृतां समाः

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥

prāpya puṇyakṛtāṃ lokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ |
śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo’bhijāyate ||

हिन्दी अनुवाद

योग से भटका हुआ व्यक्ति पुण्य करने वालों के लोकों को पाकर वहाँ बहुत वर्षों तक रहता है, और फिर पवित्र और समृद्ध लोगों के घर जन्म लेता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.41 का अर्थ क्या है?

योग से भटका हुआ व्यक्ति पुण्य करने वालों के लोकों को पाकर वहाँ बहुत वर्षों तक रहता है, और फिर पवित्र और समृद्ध लोगों के घर जन्म लेता है।

भगवद्गीता 6.41 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।