भगवद्गीता · अध्याय 18 / 18
मोक्षसंन्यासयोग — मोक्ष-संन्यास योग
78 श्लोक
अध्याय का सार
अंतिम अध्याय पूरी गीता का सार है: सच्चा त्याग कर्म का नहीं, कर्मफल की आसक्ति का त्याग है। ज्ञान, कर्म, बुद्धि और सुख के तीन प्रकार बताकर कृष्ण कहते हैं — सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ। अर्जुन का मोह नष्ट होता है और वे युद्ध के लिए तैयार होते हैं।
सभी 78 श्लोक
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18.1 · अर्जुन
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥saṃnyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum |
tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdana ||अर्जुन बोले: हे महाबाहो, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, मैं संन्यास और त्याग — दोनों का वास्तविक स्वरूप अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
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18.2 · श्रीकृष्ण
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ |
sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ ||श्रीभगवान बोले: ज्ञानी लोग कामना से प्रेरित कर्मों को छोड़ देने को संन्यास समझते हैं; और विवेकी लोग सभी कर्मों के फल को छोड़ देने को त्याग कहते हैं।
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18.3 · श्रीकृष्ण
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥tyājyaṃ doṣavadityeke karma prāhurmanīṣiṇaḥ |
yajñadānatapaḥkarma na tyājyamiti cāpare ||कुछ विचारक कहते हैं कि कर्म दोष से भरा है, इसलिए उसे छोड़ देना चाहिए; और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप के कर्म नहीं छोड़ने चाहिए।
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18.4 · श्रीकृष्ण
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥niścayaṃ śṛṇu me tatra tyāge bharatasattama |
tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṃprakīrtitaḥ ||हे भरतश्रेष्ठ, त्याग के बारे में मेरा निश्चित मत सुनो। हे पुरुषसिंह, त्याग तीन प्रकार का बताया गया है।
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18.5 · श्रीकृष्ण
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṃ kāryameva tat |
yajño dānaṃ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām ||यज्ञ, दान और तप के कर्म छोड़ने योग्य नहीं हैं; उन्हें अवश्य करना चाहिए। यज्ञ, दान और तप विवेकी लोगों को भी पवित्र करने वाले हैं।
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18.6 · श्रीकृष्ण
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥etānyapi tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca |
kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matamuttamam ||पर हे पार्थ, इन कर्मों को भी आसक्ति और फल की इच्छा छोड़कर ही करना चाहिए — यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
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18.7 · श्रीकृष्ण
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥niyatasya tu saṃnyāsaḥ karmaṇo nopapadyate |
mohāttasya parityāgastāmasaḥ parikīrtitaḥ ||नियत कर्म का संन्यास उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग तामस त्याग कहा गया है।
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18.8 · श्रीकृष्ण
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥duḥkhamityeva yatkarma kāyakleśabhayāttyajet |
sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhet ||जो कर्म को केवल दुःखदायक मानकर, शरीर के कष्ट के डर से छोड़ देता है, वह राजस त्याग करता है और उसे त्याग का फल नहीं मिलता।
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18.9 · श्रीकृष्ण
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥kāryamityeva yatkarma niyataṃ kriyate’rjuna |
saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ ||हे अर्जुन, जब नियत कर्म केवल यह मानकर किया जाता है कि यह करना ही चाहिए, और आसक्ति तथा फल की इच्छा छोड़ दी जाती है, तब वह त्याग सात्त्विक माना जाता है।
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18.10 · श्रीकृष्ण
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥na dveṣṭyakuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate |
tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ ||सत्त्व से भरा हुआ, संशयों से मुक्त, बुद्धिमान त्यागी न अप्रिय कर्म से द्वेष करता है और न प्रिय कर्म में आसक्त होता है।
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18.11 · श्रीकृष्ण
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥na hi dehabhṛtā śakyaṃ tyaktuṃ karmāṇyaśeṣataḥ |
yastu karmaphalatyāgī sa tyāgītyabhidhīyate ||देहधारी के लिए कर्मों को पूरी तरह छोड़ देना सम्भव नहीं है। इसलिए जो कर्मफल का त्याग करता है, वही त्यागी कहलाता है।
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18.12 · श्रीकृष्ण
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam |
bhavatyatyāgināṃ pretya na tu saṃnyāsināṃ kvacit ||अनचाहा, मनचाहा और मिला-जुला — कर्म का यह तीन प्रकार का फल त्याग न करने वालों को मृत्यु के बाद मिलता है; पर संन्यासियों को कभी नहीं मिलता।
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18.13 · श्रीकृष्ण
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥pañcaitāni mahābāho kāraṇāni nibodha me |
sāṃkhye kṛtānte proktāni siddhaye sarvakarmaṇām ||हे महाबाहो, सब कर्मों की सिद्धि के ये पाँच कारण मुझसे जानो, जो कर्म का अन्त बताने वाले सांख्य सिद्धान्त में कहे गए हैं —
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18.14 · श्रीकृष्ण
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham |
vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam ||— कर्म का आधार अर्थात शरीर, कर्ता, अलग-अलग साधन, तरह-तरह की अलग-अलग चेष्टाएँ, और इनमें पाँचवाँ दैव।
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18.15 · श्रीकृष्ण
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥śarīravāṅmanobhiryatkarma prārabhate naraḥ |
nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ ||मनुष्य शरीर, वाणी या मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, चाहे उचित हो या अनुचित, उसके ये पाँच ही कारण होते हैं।
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18.16 · श्रीकृष्ण
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ |
paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ ||ऐसा होने पर भी जो अपरिपक्व बुद्धि के कारण केवल आत्मा को ही कर्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि सही नहीं देखता।
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18.17 · श्रीकृष्ण
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate |
hatvāpi sa imām̐llokānna hanti na nibadhyate ||जिसमें “मैं कर्ता हूँ” का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोगों को मारकर भी वास्तव में न मारता है और न उस कर्म से बँधता है।
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18.18 · श्रीकृष्ण
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥jñānaṃ jñeyaṃ parijñātā trividhā karmacodanā |
karaṇaṃ karma karteti trividhaḥ karmasaṃgrahaḥ ||ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता — ये कर्म की तीन प्रकार की प्रेरणा हैं; और साधन, कर्म और कर्ता — ये कर्म के तीन अंग हैं।
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18.19 · श्रीकृष्ण
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ |
procyate guṇasaṃkhyāne yathāvacchṛṇu tānyapi ||गुणों के सिद्धान्त में ज्ञान, कर्म और कर्ता — तीनों को गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार का बताया गया है। इन्हें भी ठीक-ठीक सुनो।
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18.20 · श्रीकृष्ण
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥sarvabhūteṣu yenaikaṃ bhāvamavyayamīkṣate |
avibhaktaṃ vibhakteṣu tajjñānaṃ viddhi sāttvikam ||जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में एक ही अविनाशी भाव को, विभक्त दिखने वालों में अविभक्त रूप से देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।
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18.21 · श्रीकृष्ण
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥pṛthaktvena tu yajjñānaṃ nānābhāvānpṛthagvidhān |
vetti sarveṣu bhūteṣu tajjñānaṃ viddhi rājasam ||पर जो ज्ञान सब प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के भिन्न-भिन्न भावों को अलग-अलग करके ही देखता है, उस ज्ञान को राजस जानो।
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18.22 · श्रीकृष्ण
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥yattu kṛtsnavadekasminkārye saktamahaitukam |
atattvārthavadalpaṃ ca tattāmasamudāhṛtam ||और जो ज्ञान किसी एक कार्य को ही सब कुछ मानकर उसमें चिपका रहता है, जो युक्तिहीन है, सत्य के अर्थ को नहीं पकड़ता और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
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18.23 · श्रीकृष्ण
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥niyataṃ saṅgarahitamarāgadveṣataḥ kṛtam |
aphalaprepsunā karma yattatsāttvikamucyate ||जो नियत कर्म आसक्ति के बिना, राग और द्वेष के बिना, फल न चाहने वाले व्यक्ति के द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है।
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18.24 · श्रीकृष्ण
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥yattu kāmepsunā karma sāhaṃkāreṇa vā punaḥ |
kriyate bahulāyāsaṃ tadrājasamudāhṛtam ||पर जो कर्म भोगों की कामना रखने वाले, या अहंकार से भरे व्यक्ति के द्वारा बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजस कहा गया है।
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18.25 · श्रीकृष्ण
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥anubandhaṃ kṣayaṃ hiṃsāmanavekṣya ca pauruṣam |
mohādārabhyate karma yattattāmasamucyate ||जो कर्म परिणाम, हानि, दूसरों को होने वाली पीड़ा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना, केवल मोह से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहलाता है।
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18.26 · श्रीकृष्ण
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥muktasaṅgo’nahaṃvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ |
siddhyasiddhyornirvikāraḥ kartā sāttvika ucyate ||जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, “मैं-मैं” नहीं करता, धैर्य और उत्साह से भरा है, और सफलता-असफलता में विचलित नहीं होता, वह सात्त्विक कहलाता है।
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18.27 · श्रीकृष्ण
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥rāgī karmaphalaprepsurlubdho hiṃsātmako’śuciḥ |
harṣaśokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ ||जो कर्ता राग से भरा है, कर्मफल चाहता है, लोभी है, दूसरों को पीड़ा देने वाला है, अपवित्र है और हर्ष-शोक में बह जाता है, वह राजस कहा गया है।
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18.28 · श्रीकृष्ण
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko’lasaḥ |
viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate ||जो कर्ता असंयमी, असभ्य, अड़ियल, कपटी, दूसरों की आजीविका बिगाड़ने वाला, आलसी, उदास और काम को टालने वाला है, वह तामस कहलाता है।
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18.29 · श्रीकृष्ण
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥buddherbhedaṃ dhṛteścaiva guṇatastrividhaṃ śṛṇu |
procyamānamaśeṣeṇa pṛthaktvena dhanaṃjaya ||हे धनञ्जय, अब गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति के भी तीन-तीन भेद पूरे विस्तार से, अलग-अलग सुनो।
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18.30 · श्रीकृष्ण
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kāryākārye bhayābhaye |
bandhaṃ mokṣaṃ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī ||हे पार्थ, जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, तथा बन्धन और मोक्ष को ठीक-ठीक जानती है, वह सात्त्विक है।
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18.31 · श्रीकृष्ण
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥yayā dharmamadharmaṃ ca kāryaṃ cākāryameva ca |
ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī ||हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को ठीक से नहीं समझ पाता, वह बुद्धि राजस है।
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18.32 · श्रीकृष्ण
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥adharmaṃ dharmamiti yā manyate tamasāvṛtā |
sarvārthānviparītāṃśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī ||हे पार्थ, जो बुद्धि अन्धकार से ढकी होकर अधर्म को ही धर्म मान लेती है और सब बातों को उलटा ही देखती है, वह तामस है।
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18.33 · श्रीकृष्ण
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥dhṛtyā yayā dhārayate manaḥprāṇendriyakriyāḥ |
yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī ||हे पार्थ, जिस अटल धृति से मनुष्य योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को थामे रखता है, वह धृति सात्त्विक है।
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18.34 · श्रीकृष्ण
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥yayā tu dharmakāmārthāndhṛtyā dhārayate’rjuna |
prasaṅgena phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī ||पर हे अर्जुन, जिस धृति से मनुष्य फल की इच्छा रखते हुए, आसक्तिपूर्वक धर्म, काम और अर्थ को पकड़े रहता है, हे पार्थ, वह धृति राजस है।
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18.35 · श्रीकृष्ण
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥yayā svapnaṃ bhayaṃ śokaṃ viṣādaṃ madameva ca |
na vimuñcati durmedhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī ||हे पार्थ, जिस धृति के कारण मन्दबुद्धि मनुष्य नींद, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता, वह धृति तामस है।
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18.36 · श्रीकृष्ण
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥sukhaṃ tvidānīṃ trividhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha |
abhyāsādramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati ||हे भरतश्रेष्ठ, अब मुझसे तीन प्रकार के सुख के बारे में सुनो। जिस सुख में मनुष्य अभ्यास से रमता है और जिसमें उसके दुःखों का अन्त हो जाता है —
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18.37 · श्रीकृष्ण
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥yattadagre viṣamiva pariṇāme’mṛtopamam |
tatsukhaṃ sāttvikaṃ proktamātmabuddhiprasādajam ||— जो आरम्भ में विष जैसा लगता है पर परिणाम में अमृत जैसा होता है, और अपनी बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है — वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
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18.38 · श्रीकृष्ण
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥viṣayendriyasaṃyogādyattadagre’mṛtopamam |
pariṇāme viṣamiva tatsukhaṃ rājasaṃ smṛtam ||जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होता है, आरम्भ में अमृत जैसा लगता है पर परिणाम में विष जैसा होता है, वह सुख राजस कहा गया है।
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18.39 · श्रीकृष्ण
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥yadagre cānubandhe ca sukhaṃ mohanamātmanaḥ |
nidrālasyapramādotthaṃ tattāmasamudāhṛtam ||जो सुख आरम्भ में भी और परिणाम में भी मनुष्य को मोह में डालता है, और नींद, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामस कहा गया है।
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18.40 · श्रीकृष्ण
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ |
sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥ ||पृथ्वी पर, या स्वर्ग में देवताओं के बीच भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
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18.41 · श्रीकृष्ण
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥brāhmaṇakṣatriyaviśāṃ śūdrāṇāṃ ca parantapa |
karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavairguṇaiḥ ||हे परन्तप, ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के, तथा शूद्रों के भी कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं।
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18.42 · श्रीकृष्ण
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥śamo damastapaḥ śaucaṃ kṣāntirārjavameva ca |
jñānaṃ vijñānamāstikyaṃ brahmakarma svabhāvajam ||शम, दम, तप, पवित्रता, क्षमा और सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता — ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
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18.43 · श्रीकृष्ण
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥śauryaṃ tejo dhṛtirdākṣyaṃ yuddhe cāpyapalāyanam |
dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṃ karma svabhāvajam ||शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से पीछे न हटना, दान और नेतृत्व का भाव — ये क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
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18.44 · श्रीकृष्ण
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam |
paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam ||खेती, पशुपालन और व्यापार वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं; और सेवा का कार्य शूद्र के स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।
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18.45 · श्रीकृष्ण
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ |
svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu ||अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा व्यक्ति किस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनो।
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18.46 · श्रीकृष्ण
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam |
svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥ ||जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उसकी अपने कर्म के द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।
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18.47 · श्रीकृष्ण
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt |
svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||अच्छी तरह निभाए गए दूसरे के धर्म से अपना धर्म, कमियों के साथ भी, श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप का भागी नहीं होता।
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18.48 · श्रीकृष्ण
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥sahajaṃ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet |
sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnirivāvṛtāḥ ||हे कुन्तीपुत्र, अपने सहज कर्म को, उसमें दोष होने पर भी, नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि जैसे आग धुएँ से ढकी रहती है, वैसे ही हर आरम्भ किसी न किसी दोष से ढका रहता है।
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18.49 · श्रीकृष्ण
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ |
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati ||जिसकी बुद्धि कहीं भी आसक्त नहीं, जिसने अपने आप को जीत लिया है और जिसकी लालसा मिट गई है, वह संन्यास के द्वारा नैष्कर्म्य की परम सिद्धि को पाता है।
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18.50 · श्रीकृष्ण
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥siddhiṃ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me |
samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā ||हे कुन्तीपुत्र, सिद्धि पाया हुआ मनुष्य ज्ञान की उस परम निष्ठा, ब्रह्म को, कैसे प्राप्त होता है — यह मुझसे संक्षेप में जानो।
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18.51 · श्रीकृष्ण
बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥buddhyā viśuddhyā yukto dhṛtyātmānaṃ niyamya ca |
śabdādīnviṣayāṃstyaktvā rāgadveṣau vyudasya ca ||शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धृति से अपने आप को वश में करके, शब्द आदि विषयों को छोड़कर, राग और द्वेष को दूर हटाकर —
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18.52 · श्रीकृष्ण
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ |
dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ ||— एकान्त में रहते हुए, थोड़ा भोजन करते हुए, वाणी, शरीर और मन को संयम में रखते हुए, सदा ध्यानयोग में लगे रहकर, वैराग्य का आश्रय लेकर —
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18.53 · श्रीकृष्ण
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ahaṃkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ parigraham |
vimucya nirmamaḥ śānto brahmabhūyāya kalpate ||— अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और संग्रह को छोड़कर, ममता से रहित और शान्त होकर वह ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है।
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18.54 · श्रीकृष्ण
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati |
samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām ||ब्रह्मभाव को प्राप्त, भीतर से प्रसन्न वह न शोक करता है, न कुछ चाहता है। सब प्राणियों के प्रति समभाव रखते हुए वह मेरी परम भक्ति पाता है।
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18.55 · श्रीकृष्ण
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥bhaktyā māmabhijānāti yāvānyaścāsmi tattvataḥ |
tato māṃ tattvato jñātvā viśate tadanantaram ||भक्ति के द्वारा वह मुझे तत्त्व से जान लेता है कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ। फिर मुझे तत्त्व से जानकर वह उसी क्षण मुझमें प्रवेश कर जाता है।
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18.56 · श्रीकृष्ण
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ |
matprasādādavāpnoti śāśvataṃ padamavyayam ||मेरी शरण में रहने वाला मनुष्य सदा सब प्रकार के कर्म करते हुए भी मेरी कृपा से सनातन, अविनाशी पद को पा लेता है।
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18.57 · श्रीकृष्ण
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥cetasā sarvakarmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ |
buddhiyogamupāśritya maccittaḥ satataṃ bhava ||मन से सब कर्म मुझे अर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, बुद्धियोग का सहारा लेकर, सदा अपना चित्त मुझमें लगाए रखो।
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18.58 · श्रीकृष्ण
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi |
atha cettvamahaṃkārānna śroṣyasi vinaṅkṣyasi ||मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर जाओगे। पर यदि अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे।
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18.59 · श्रीकृष्ण
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥yadahaṃkāramāśritya na yotsya iti manyase |
mithyaiṣa vyavasāyaste prakṛtistvāṃ niyokṣyati ||यदि अहंकार का सहारा लेकर तुम यह सोचते हो कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा”, तो तुम्हारा यह निश्चय व्यर्थ है; तुम्हारी प्रकृति ही तुम्हें इसमें लगा देगी।
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18.60 · श्रीकृष्ण
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥svabhāvajena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇā |
kartuṃ necchasi yanmohātkariṣyasyavaśo’pi tat ||हे कुन्तीपुत्र, अपने स्वभाव से उत्पन्न अपने कर्म से बँधे होने के कारण, जिसे तुम मोह के कारण करना नहीं चाहते, वह भी विवश होकर करोगे।
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18.61 · श्रीकृष्ण
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ hṛddeśe’rjuna tiṣṭhati |
bhrāmayansarvabhūtāni yantrārūḍhāni māyayā ||हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहता है और अपनी माया से सब प्राणियों को ऐसे घुमाता है मानो वे किसी यन्त्र पर चढ़े हों।
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18.62 · श्रीकृष्ण
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥tameva śaraṇaṃ gaccha sarvabhāvena bhārata |
tatprasādātparāṃ śāntiṃ sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam ||हे भारत, पूरे भाव से उसी की शरण में जाओ। उसकी कृपा से तुम परम शान्ति और सनातन धाम पाओगे।
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18.63 · श्रीकृष्ण
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥iti te jñānamākhyātaṃ guhyādguhyataraṃ mayā |
vimṛśyaitadaśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru ||इस प्रकार मैंने तुम्हें यह ज्ञान बताया, जो गुप्त से भी अधिक गुप्त है। इस पर पूरी तरह विचार करो, फिर जैसा चाहो वैसा करो।
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18.64 · श्रीकृष्ण
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥sarvaguhyatamaṃ bhūyaḥ śṛṇu me paramaṃ vacaḥ |
iṣṭo’si me dṛḍhamiti tato vakṣyāmi te hitam ||सबसे गुप्त मेरा परम वचन फिर से सुनो। तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए तुम्हारे हित की बात कहूँगा।
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18.65 · श्रीकृष्ण
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru |
māmevaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo’si me ||अपना मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे प्रणाम करो। तुम मुझे ही प्राप्त होगे — यह मैं तुमसे सच्चा वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।
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18.66 · श्रीकृष्ण
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥sarvadharmānparityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja |
ahaṃ tvā sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत करो।
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18.67 · श्रीकृष्ण
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥idaṃ te nātapaskāya nābhaktāya kadācana |
na cāśuśrūṣave vācyaṃ na ca māṃ yo’bhyasūyati ||यह ज्ञान ऐसे व्यक्ति को कभी नहीं कहना चाहिए जिसमें तप न हो, जो भक्त न हो, जो सुनना न चाहता हो, या जो मुझमें दोष ढूँढता हो।
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18.68 · श्रीकृष्ण
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ya imaṃ paramaṃ guhyaṃ madbhakteṣvabhidhāsyati |
bhaktiṃ mayi parāṃ kṛtvā māmevaiṣyatyasaṃśayaḥ ||जो मेरी परम भक्ति करते हुए यह परम गुप्त ज्ञान मेरे भक्तों को सुनाएगा, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।
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18.69 · श्रीकृष्ण
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥na ca tasmānmanuṣyeṣu kaścinme priyakṛttamaḥ |
bhavitā na ca me tasmādanyaḥ priyataro bhuvi ||मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है, और न पृथ्वी पर उससे अधिक प्रिय मुझे कोई और होगा।
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18.70 · श्रीकृष्ण
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥adhyeṣyate ca ya imaṃ dharmyaṃ saṃvādamāvayoḥ |
jñānayajñena tenāhamiṣṭaḥ syāmiti me matiḥ ||और जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है।
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18.71 · श्रीकृष्ण
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥śraddhāvānanasūyaśca śṛṇuyādapi yo naraḥ |
so’pi muktaḥ śubhām̐llokānprāpnuyātpuṇyakarmaṇām ||और जो मनुष्य श्रद्धा के साथ, दोष-दृष्टि के बिना इसे केवल सुनेगा, वह भी मुक्त होकर पुण्यकर्म करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।
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18.72 · श्रीकृष्ण
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥kaccidetacchrutaṃ pārtha tvayaikāgreṇa cetasā |
kaccidajñānasaṃmohaḥ pranaṣṭaste dhanaṃjaya ||हे पार्थ, क्या तुमने इसे एकाग्र मन से सुना? हे धनञ्जय, क्या अज्ञान से उत्पन्न तुम्हारा मोह नष्ट हो गया?
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18.73 · अर्जुन
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥naṣṭo mohaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayācyuta |
sthito’smi gatasandehaḥ kariṣye vacanaṃ tava ||अर्जुन बोले: हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे अपनी स्मृति फिर मिल गई है। मेरे संशय दूर हो गए हैं और मैं दृढ़ खड़ा हूँ। मैं आपके वचन का पालन करूँगा।
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18.74 · संजय
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ityahaṃ vāsudevasya pārthasya ca mahātmanaḥ |
saṃvādamimamaśrauṣamadbhutaṃ romaharṣaṇam ||संजय बोले: इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ का यह अद्भुत, रोमांचित कर देने वाला संवाद सुना।
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18.75 · संजय
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥vyāsaprasādācchrutavānetadguhyamahaṃ param |
yogaṃ yogeśvarātkṛṣṇātsākṣātkathayataḥ svayam ||व्यास जी की कृपा से मैंने यह परम गुप्त योग स्वयं योगेश्वर कृष्ण के मुख से, उन्हें स्वयं कहते हुए, प्रत्यक्ष सुना।
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18.76 · संजय
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥rājansaṃsmṛtya saṃsmṛtya saṃvādamimamadbhutam |
keśavārjunayoḥ puṇyaṃ hṛṣyāmi ca muhurmuhuḥ ||हे राजन, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार आनन्दित हो रहा हूँ।
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18.77 · संजय
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥tacca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpamatyadbhutaṃ hareḥ |
vismayo me mahān rājanhṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ ||और हे राजन, हरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को बार-बार याद करके मुझे बड़ा विस्मय होता है, और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
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18.78 · संजय
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥yatra yogeśvaraḥ kṛṣṇo yatra pārtho dhanurdharaḥ |
tatra śrīrvijayo bhūtirdhruvā nītirmatirmama ||जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, कल्याण और अटल नीति है — ऐसा मेरा मत है।