भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 31 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.31 · यया धर्ममधर्मं च कार्यं

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥

yayā dharmamadharmaṃ ca kāryaṃ cākāryameva ca |
ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī ||

हिन्दी अनुवाद

हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को ठीक से नहीं समझ पाता, वह बुद्धि राजस है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.31 का अर्थ क्या है?

हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को ठीक से नहीं समझ पाता, वह बुद्धि राजस है।

भगवद्गीता 18.31 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।