भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.5 · यज्ञदानतपःकर्म न तत्

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥

yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṃ kāryameva tat |
yajño dānaṃ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām ||

हिन्दी अनुवाद

यज्ञ, दान और तप के कर्म छोड़ने योग्य नहीं हैं; उन्हें अवश्य करना चाहिए। यज्ञ, दान और तप विवेकी लोगों को भी पवित्र करने वाले हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.5 का अर्थ क्या है?

यज्ञ, दान और तप के कर्म छोड़ने योग्य नहीं हैं; उन्हें अवश्य करना चाहिए। यज्ञ, दान और तप विवेकी लोगों को भी पवित्र करने वाले हैं।

भगवद्गीता 18.5 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।