भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.4 · निश्चयं शृणु मे तत्र

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥

niścayaṃ śṛṇu me tatra tyāge bharatasattama |
tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṃprakīrtitaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ, त्याग के बारे में मेरा निश्चित मत सुनो। हे पुरुषसिंह, त्याग तीन प्रकार का बताया गया है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.4 का अर्थ क्या है?

हे भरतश्रेष्ठ, त्याग के बारे में मेरा निश्चित मत सुनो। हे पुरुषसिंह, त्याग तीन प्रकार का बताया गया है।

भगवद्गीता 18.4 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।