भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 2 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.2 · काम्यानां कर्मणां न्यासं

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥

kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ |
sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ ||

हिन्दी अनुवाद

श्रीभगवान बोले: ज्ञानी लोग कामना से प्रेरित कर्मों को छोड़ देने को संन्यास समझते हैं; और विवेकी लोग सभी कर्मों के फल को छोड़ देने को त्याग कहते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.2 का अर्थ क्या है?

श्रीभगवान बोले: ज्ञानी लोग कामना से प्रेरित कर्मों को छोड़ देने को संन्यास समझते हैं; और विवेकी लोग सभी कर्मों के फल को छोड़ देने को त्याग कहते हैं।

भगवद्गीता 18.2 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।