भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 59 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.59 · यदहंकारमाश्रित्य न इति
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥
yadahaṃkāramāśritya na yotsya iti manyase |
mithyaiṣa vyavasāyaste prakṛtistvāṃ niyokṣyati ||
हिन्दी अनुवाद
यदि अहंकार का सहारा लेकर तुम यह सोचते हो कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा”, तो तुम्हारा यह निश्चय व्यर्थ है; तुम्हारी प्रकृति ही तुम्हें इसमें लगा देगी।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.59 का अर्थ क्या है?
यदि अहंकार का सहारा लेकर तुम यह सोचते हो कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा”, तो तुम्हारा यह निश्चय व्यर्थ है; तुम्हारी प्रकृति ही तुम्हें इसमें लगा देगी।
भगवद्गीता 18.59 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।