भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 60 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.60 · स्वभावजेन कौन्तेय स्वेन

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥

svabhāvajena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇā |
kartuṃ necchasi yanmohātkariṣyasyavaśo’pi tat ||

हिन्दी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र, अपने स्वभाव से उत्पन्न अपने कर्म से बँधे होने के कारण, जिसे तुम मोह के कारण करना नहीं चाहते, वह भी विवश होकर करोगे।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.60 का अर्थ क्या है?

हे कुन्तीपुत्र, अपने स्वभाव से उत्पन्न अपने कर्म से बँधे होने के कारण, जिसे तुम मोह के कारण करना नहीं चाहते, वह भी विवश होकर करोगे।

भगवद्गीता 18.60 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।