भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 12 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.12 · अनिष्टमिष्टं मिश्रं च
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥
aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam |
bhavatyatyāgināṃ pretya na tu saṃnyāsināṃ kvacit ||
हिन्दी अनुवाद
अनचाहा, मनचाहा और मिला-जुला — कर्म का यह तीन प्रकार का फल त्याग न करने वालों को मृत्यु के बाद मिलता है; पर संन्यासियों को कभी नहीं मिलता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.12 का अर्थ क्या है?
अनचाहा, मनचाहा और मिला-जुला — कर्म का यह तीन प्रकार का फल त्याग न करने वालों को मृत्यु के बाद मिलता है; पर संन्यासियों को कभी नहीं मिलता।
भगवद्गीता 18.12 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।