भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 52 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.52 · विविक्तसेवी लघ्वाशी
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ |
dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
— एकान्त में रहते हुए, थोड़ा भोजन करते हुए, वाणी, शरीर और मन को संयम में रखते हुए, सदा ध्यानयोग में लगे रहकर, वैराग्य का आश्रय लेकर —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.52 का अर्थ क्या है?
— एकान्त में रहते हुए, थोड़ा भोजन करते हुए, वाणी, शरीर और मन को संयम में रखते हुए, सदा ध्यानयोग में लगे रहकर, वैराग्य का आश्रय लेकर —
भगवद्गीता 18.52 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।