भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 22 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.22 · यत्तु सक्तमहैतुकम्
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥
yattu kṛtsnavadekasminkārye saktamahaitukam |
atattvārthavadalpaṃ ca tattāmasamudāhṛtam ||
हिन्दी अनुवाद
और जो ज्ञान किसी एक कार्य को ही सब कुछ मानकर उसमें चिपका रहता है, जो युक्तिहीन है, सत्य के अर्थ को नहीं पकड़ता और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.22 का अर्थ क्या है?
और जो ज्ञान किसी एक कार्य को ही सब कुछ मानकर उसमें चिपका रहता है, जो युक्तिहीन है, सत्य के अर्थ को नहीं पकड़ता और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
भगवद्गीता 18.22 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।