भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 68 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.68 · य इमं परमं गुह्यं

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥

ya imaṃ paramaṃ guhyaṃ madbhakteṣvabhidhāsyati |
bhaktiṃ mayi parāṃ kṛtvā māmevaiṣyatyasaṃśayaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

जो मेरी परम भक्ति करते हुए यह परम गुप्त ज्ञान मेरे भक्तों को सुनाएगा, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.68 का अर्थ क्या है?

जो मेरी परम भक्ति करते हुए यह परम गुप्त ज्ञान मेरे भक्तों को सुनाएगा, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।

भगवद्गीता 18.68 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।