भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 47 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.47 · श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt |
svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||
हिन्दी अनुवाद
अच्छी तरह निभाए गए दूसरे के धर्म से अपना धर्म, कमियों के साथ भी, श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप का भागी नहीं होता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.47 का अर्थ क्या है?
अच्छी तरह निभाए गए दूसरे के धर्म से अपना धर्म, कमियों के साथ भी, श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप का भागी नहीं होता।
भगवद्गीता 18.47 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।