भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 10 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.10 · न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥
na dveṣṭyakuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate |
tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
सत्त्व से भरा हुआ, संशयों से मुक्त, बुद्धिमान त्यागी न अप्रिय कर्म से द्वेष करता है और न प्रिय कर्म में आसक्त होता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.10 का अर्थ क्या है?
सत्त्व से भरा हुआ, संशयों से मुक्त, बुद्धिमान त्यागी न अप्रिय कर्म से द्वेष करता है और न प्रिय कर्म में आसक्त होता है।
भगवद्गीता 18.10 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।