भगवद्गीता · अध्याय 4 / 18

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग — ज्ञान-कर्म-संन्यास योग

42 श्लोक

अध्याय का सार

कृष्ण बताते हैं कि यह योग प्राचीन काल से चला आ रहा है और धर्म की रक्षा के लिए वे युग-युग में अवतार लेते हैं। वे कर्म, अकर्म और विकर्म का भेद समझाते हैं, अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन करते हैं और ज्ञान को सबसे पवित्र बताते हैं।

सभी 42 श्लोक

  1. 4.1 · श्रीकृष्ण

    इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
    विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥

    imaṃ vivasvate yogaṃ proktavānahamavyayam |
    vivasvānmanave prāha manurikṣvākave’bravīt ||

    श्रीभगवान बोले: यह अविनाशी योग मैंने विवस्वान (सूर्य) को बताया था; विवस्वान ने इसे मनु से कहा, और मनु ने इक्ष्वाकु को सिखाया।

  2. 4.2 · श्रीकृष्ण

    एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
    स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥

    evaṃ paramparāprāptamimaṃ rājarṣayo viduḥ |
    sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa ||

    इस प्रकार परंपरा से चले आते इस योग को राजर्षियों ने जाना। पर हे परन्तप, लंबा समय बीतने से वह योग इस संसार में लुप्त हो गया।

  3. 4.3 · श्रीकृष्ण

    स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
    भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥

    sa evāyaṃ mayā te’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ |
    bhakto’si me sakhā ceti rahasyaṃ hyetaduttamam ||

    वही पुरातन योग आज मैंने तुम्हें बताया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह निश्चय ही परम रहस्य है।

  4. 4.4 · अर्जुन

    अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
    कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥

    aparaṃ bhavato janma paraṃ janma vivasvataḥ |
    kathametadvijānīyāṃ tvamādau proktavāniti ||

    अर्जुन बोले: आपका जन्म तो बाद में हुआ और विवस्वान का जन्म बहुत पहले। फिर मैं यह कैसे समझूँ कि आरंभ में आपने ही उन्हें यह बताया था?

  5. 4.5 · श्रीकृष्ण

    बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
    तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥

    bahūni me vyatītāni janmāni tava cārjuna |
    tānyahaṃ veda sarvāṇi na tvaṃ vettha parantapa ||

    श्रीभगवान बोले: हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। मैं उन सबको जानता हूँ, पर हे परन्तप, तुम उन्हें नहीं जानते।

  6. 4.6 · श्रीकृष्ण

    अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
    प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥

    ajo’pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro’pi san |
    prakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya saṃbhavāmyātmamāyayā ||

    अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी, सब प्राणियों का स्वामी होते हुए भी, मैं अपनी प्रकृति को अधीन रखकर अपनी माया से प्रकट होता हूँ।

  7. 4.7 · श्रीकृष्ण

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

    yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata |
    abhyutthānamadharmasya tadātmānaṃ sṛjāmyaham ||

    हे भारत, जब कभी धर्म क्षीण होने लगता है और अधर्म सिर उठाता है, तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

  8. 4.8 · श्रीकृष्ण

    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

    paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām |
    dharmasaṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ||

    सज्जनों की रक्षा, दुष्कर्मियों के विनाश और धर्म को फिर से स्थापित करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

  9. 4.9 · श्रीकृष्ण

    जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
    त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

    janma karma ca me divyamevaṃ yo vetti tattvataḥ |
    tyaktvā dehaṃ punarjanma naiti māmeti so’rjuna ||

    हे अर्जुन, जो मेरे इस दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर छोड़ने के बाद फिर जन्म नहीं लेता, बल्कि मुझे प्राप्त होता है।

  10. 4.10 · श्रीकृष्ण

    वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
    बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥

    vītarāgabhayakrodhā manmayā māmupāśritāḥ |
    bahavo jñānatapasā pūtā madbhāvamāgatāḥ ||

    राग, भय और क्रोध से मुक्त, मुझमें तन्मय, मेरी शरण में आए बहुत-से लोग ज्ञान के तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।

  11. 4.11 · श्रीकृष्ण

    ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
    मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

    ye yathā māṃ prapadyante tāṃstathaiva bhajāmyaham |
    mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||

    जो जिस भाव से मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार अपनाता हूँ। हे पार्थ, सब मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग पर चलते हैं।

  12. 4.12 · श्रीकृष्ण

    काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
    क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

    kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ |
    kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajā ||

    कर्मों में सफलता चाहने वाले लोग इस संसार में देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि मनुष्यलोक में कर्म से मिलने वाली सफलता जल्दी मिलती है।

  13. 4.13 · श्रीकृष्ण

    चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
    तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

    cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ |
    tasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam ||

    गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार चार वर्णों की व्यवस्था मैंने रची है। उसका रचयिता होते हुए भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।

  14. 4.14 · श्रीकृष्ण

    न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
    इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥

    na māṃ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā |
    iti māṃ yo’bhijānāti karmabhirna sa badhyate ||

    कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और न मुझे कर्मों के फल की इच्छा है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।

  15. 4.15 · श्रीकृष्ण

    एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
    कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥

    evaṃ jñātvā kṛtaṃ karma pūrvairapi mumukṣubhiḥ |
    kuru karmaiva tasmāttvaṃ pūrvaiḥ pūrvataraṃ kṛtam ||

    यह जानकर ही मुक्ति चाहने वाले प्राचीन लोगों ने भी कर्म किया था। इसलिए तुम भी वैसे ही कर्म करो जैसे पूर्वजों ने पहले किया था।

  16. 4.16 · श्रीकृष्ण

    किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
    तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥

    kiṃ karma kimakarmeti kavayo’pyatra mohitāḥ |
    tatte karma pravakṣyāmi yajjñātvā mokṣyase’śubhāt ||

    कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इस विषय में ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें कर्म का वह रहस्य बताऊँगा जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।

  17. 4.17 · श्रीकृष्ण

    कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
    अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥

    karmaṇo hyapi boddhavyaṃ boddhavyaṃ ca vikarmaṇaḥ |
    akarmaṇaśca boddhavyaṃ gahanā karmaṇo gatiḥ ||

    कर्म को भी समझना चाहिए, विकर्म (निषिद्ध कर्म) को भी, और अकर्म को भी; क्योंकि कर्म की गति गहन है।

  18. 4.18 · श्रीकृष्ण

    कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
    स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥

    karmaṇyakarma yaḥ paśyedakarmaṇi ca karma yaḥ |
    sa buddhimānmanuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛt ||

    जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है; वह योगी है और सारे कर्मों को पूर्ण करने वाला है।

  19. 4.19 · श्रीकृष्ण

    यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
    ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥

    yasya sarve samārambhāḥ kāmasaṃkalpavarjitāḥ |
    jñānāgnidagdhakarmāṇaṃ tamāhuḥ paṇḍitaṃ budhāḥ ||

    जिसके सारे कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, जिसके कर्म ज्ञान की आग में जल चुके हैं, उसे ज्ञानी लोग पण्डित कहते हैं।

  20. 4.20 · श्रीकृष्ण

    त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
    कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥

    tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ |
    karmaṇyabhipravṛtto’pi naiva kiṃcitkaroti saḥ ||

    कर्म के फल की आसक्ति छोड़कर, सदा तृप्त और किसी सहारे पर निर्भर न रहने वाला व्यक्ति कर्म में पूरी तरह लगा रहकर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।

  21. 4.21 · श्रीकृष्ण

    निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
    शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

    nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ |
    śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||

    जो आशा से रहित है, जिसने मन और शरीर को वश में किया है, जिसने संग्रह का सब भाव छोड़ दिया है, वह केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करते हुए पाप का भागी नहीं होता।

  22. 4.22 · श्रीकृष्ण

    यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
    समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

    yadṛcchālābhasaṃtuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ |
    samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate ||

    जो अपने-आप मिल जाए उसी में संतुष्ट, द्वन्द्वों से परे, ईर्ष्या से रहित, और सफलता-असफलता में समान रहने वाला व्यक्ति कर्म करके भी नहीं बँधता।

  23. 4.23 · श्रीकृष्ण

    गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
    यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥

    gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacetasaḥ |
    yajñāyācarataḥ karma samagraṃ pravilīyate ||

    जिसकी आसक्ति मिट गई है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है और जो यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसके सारे कर्म पूरी तरह विलीन हो जाते हैं।

  24. 4.24 · श्रीकृष्ण

    ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
    ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥

    brahmārpaṇaṃ brahma havirbrahmāgnau brahmaṇā hutam |
    brahmaiva tena gantavyaṃ brahmakarmasamādhinā ||

    अर्पण ब्रह्म है, आहुति ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म के द्वारा ही आहुति दी जाती है। जो सब कर्मों में ब्रह्म को देखता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।

  25. 4.25 · श्रीकृष्ण

    दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
    ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥

    daivamevāpare yajñaṃ yoginaḥ paryupāsate |
    brahmāgnāvapare yajñaṃ yajñenaivopajuhvati ||

    कुछ योगी देवताओं के लिए ही यज्ञ करते हैं; दूसरे ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ को ही आहुति बनाकर अर्पित कर देते हैं।

  26. 4.26 · श्रीकृष्ण

    श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
    शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥

    śrotrādīnīndriyāṇyanye saṃyamāgniṣu juhvati |
    śabdādīnviṣayānanya indriyāgniṣu juhvati ||

    कुछ लोग सुनने आदि इन्द्रियों को संयम की अग्नि में होम करते हैं, और कुछ शब्द आदि विषयों को इन्द्रियों की अग्नि में होम करते हैं।

  27. 4.27 · श्रीकृष्ण

    सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
    आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥

    sarvāṇīndriyakarmāṇi prāṇakarmāṇi cāpare |
    ātmasaṃyamayogāgnau juhvati jñānadīpite ||

    कुछ लोग इन्द्रियों के सब कर्मों और प्राणों के सब कर्मों को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयम-योग की अग्नि में होम कर देते हैं।

  28. 4.28 · श्रीकृष्ण

    द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
    स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥

    dravyayajñāstapoyajñā yogayajñāstathāpare |
    svādhyāyajñānayajñāśca yatayaḥ saṃśitavratāḥ ||

    कुछ लोग धन का यज्ञ करते हैं, कुछ तप का, कुछ योग का; और कठोर व्रत धारण करने वाले यत्नशील साधक स्वाध्याय और ज्ञान का यज्ञ करते हैं।

  29. 4.29 · श्रीकृष्ण

    अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
    प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥

    apāne juhvati prāṇaṃ prāṇe’pānaṃ tathāpare |
    prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥ ||

    प्राणायाम में लगे कुछ लोग प्राण और अपान की गति रोककर अपान में प्राण को और प्राण में अपान को होम करते हैं।

  30. 4.30 · श्रीकृष्ण

    अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
    सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥

    apare niyatāhārāḥ prāṇānprāṇeṣu juhvati |
    sarve’pyete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ ||

    दूसरे लोग आहार नियमित करके प्राणों को प्राणों में होम करते हैं। ये सभी यज्ञ का मर्म जानते हैं और यज्ञ के द्वारा इनके पाप नष्ट हो चुके हैं।

  31. 4.31 · श्रीकृष्ण

    यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
    नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥

    yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam |
    nāyaṃ loko’styayajñasya kuto’nyaḥ kurusattama ||

    हे कुरुश्रेष्ठ, यज्ञ से बचे अमृत का भोग करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं, फिर परलोक कैसे?

  32. 4.32 · श्रीकृष्ण

    एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
    कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥

    evaṃ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe |
    karmajānviddhi tānsarvānevaṃ jñātvā vimokṣyase ||

    इस प्रकार वेद की वाणी में अनेक प्रकार के यज्ञ विस्तार से बताए गए हैं। उन सबको कर्म से उत्पन्न जानो; ऐसा जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

  33. 4.33 · श्रीकृष्ण

    श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
    सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥

    śreyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa |
    sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate ||

    हे परन्तप, द्रव्य से होने वाले यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ, सारे कर्म अपनी पूर्णता ज्ञान में ही पाते हैं।

  34. 4.34 · श्रीकृष्ण

    तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
    उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

    tadviddhi praṇipātena paripraśnena sevayā |
    upadekṣyanti te jñānaṃ jñāninastattvadarśinaḥ ||

    उस ज्ञान को विनम्र प्रणाम, जिज्ञासा भरे प्रश्नों और सेवा के द्वारा जानो। तत्त्व को देख चुके ज्ञानी तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे।

  35. 4.35 · श्रीकृष्ण

    यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
    येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥

    yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava |
    yena bhūtānyaśeṣeṇa drakṣyasyātmanyatho mayi ||

    हे पाण्डव, उसे जानकर तुम फिर इस प्रकार मोह में नहीं पड़ोगे। उसके द्वारा तुम सब प्राणियों को पहले अपने में और फिर मुझमें देखोगे।

  36. 4.36 · श्रीकृष्ण

    अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
    सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥

    api cedasi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpakṛttamaḥ |
    sarvaṃ jñānaplavenaiva vṛjinaṃ santariṣyasi ||

    यदि तुम सब पापियों से भी बढ़कर पापी हो, तब भी ज्ञान की नौका से सारे पाप के सागर को पार कर जाओगे।

  37. 4.37 · श्रीकृष्ण

    यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
    ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥

    yathaidhāṃsi samiddho’gnirbhasmasātkurute’rjuna |
    jñānāgniḥ sarvakarmāṇi bhasmasātkurute tathā ||

    हे अर्जुन, जैसे धधकती आग ईंधन को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों को राख कर देती है।

  38. 4.38 · श्रीकृष्ण

    न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
    तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥

    na hi jñānena sadṛśaṃ pavitramiha vidyate |
    tatsvayaṃ yogasaṃsiddhaḥ kālenātmani vindati ||

    इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय आने पर उसे अपने भीतर स्वयं पा लेता है।

  39. 4.39 · श्रीकृष्ण

    श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
    ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

    śraddhāvām̐llabhate jñānaṃ tatparaḥ saṃyatendriyaḥ |
    jñānaṃ labdhvā parāṃ śāntimacireṇādhigacchati ||

    श्रद्धावान, ज्ञान में तत्पर और इन्द्रियों को वश में रखने वाला व्यक्ति ज्ञान पाता है; और ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शांति प्राप्त कर लेता है।

  40. 4.40 · श्रीकृष्ण

    अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
    नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥

    ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati |
    nāyaṃ loko’sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ ||

    अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशय से भरा व्यक्ति नष्ट हो जाता है। संशयग्रस्त के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।

  41. 4.41 · श्रीकृष्ण

    योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
    आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥

    yogasaṃnyastakarmāṇaṃ jñānasaṃchinnasaṃśayam |
    ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanaṃjaya ||

    हे धनञ्जय, जिसने योग के द्वारा कर्मों को त्याग दिया है, जिसके संशय ज्ञान से कट गए हैं, उस आत्मवान को कर्म नहीं बाँधते।

  42. 4.42 · श्रीकृष्ण

    तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
    छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥

    tasmādajñānasambhūtaṃ hṛtsthaṃ jñānāsinātmanaḥ |
    chittvainaṃ saṃśayaṃ yogamātiṣṭhottiṣṭha bhārata ||

    इसलिए हे भारत, अज्ञान से जन्मे और हृदय में बसे इस संशय को ज्ञान की तलवार से काटकर योग का आश्रय लो और उठ खड़े हो।

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