भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 14 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.14 · न मां कर्माणि लिम्पन्ति
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
na māṃ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā |
iti māṃ yo’bhijānāti karmabhirna sa badhyate ||
हिन्दी अनुवाद
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और न मुझे कर्मों के फल की इच्छा है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.14 का अर्थ क्या है?
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और न मुझे कर्मों के फल की इच्छा है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
भगवद्गीता 4.14 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।