भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 35 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 4.35 · यज्ज्ञात्वा न यास्यसि

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥

yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava |
yena bhūtānyaśeṣeṇa drakṣyasyātmanyatho mayi ||

हिन्दी अनुवाद

हे पाण्डव, उसे जानकर तुम फिर इस प्रकार मोह में नहीं पड़ोगे। उसके द्वारा तुम सब प्राणियों को पहले अपने में और फिर मुझमें देखोगे।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 4.35 का अर्थ क्या है?

हे पाण्डव, उसे जानकर तुम फिर इस प्रकार मोह में नहीं पड़ोगे। उसके द्वारा तुम सब प्राणियों को पहले अपने में और फिर मुझमें देखोगे।

भगवद्गीता 4.35 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।