भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 34 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.34 · तद्विद्धि प्रणिपातेन
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
tadviddhi praṇipātena paripraśnena sevayā |
upadekṣyanti te jñānaṃ jñāninastattvadarśinaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
उस ज्ञान को विनम्र प्रणाम, जिज्ञासा भरे प्रश्नों और सेवा के द्वारा जानो। तत्त्व को देख चुके ज्ञानी तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.34 का अर्थ क्या है?
उस ज्ञान को विनम्र प्रणाम, जिज्ञासा भरे प्रश्नों और सेवा के द्वारा जानो। तत्त्व को देख चुके ज्ञानी तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे।
भगवद्गीता 4.34 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।