भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 33 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 4.33 · श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥

śreyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa |
sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate ||

हिन्दी अनुवाद

हे परन्तप, द्रव्य से होने वाले यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ, सारे कर्म अपनी पूर्णता ज्ञान में ही पाते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 4.33 का अर्थ क्या है?

हे परन्तप, द्रव्य से होने वाले यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ, सारे कर्म अपनी पूर्णता ज्ञान में ही पाते हैं।

भगवद्गीता 4.33 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।