भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 31 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.31 · यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥
yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam |
nāyaṃ loko’styayajñasya kuto’nyaḥ kurusattama ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ, यज्ञ से बचे अमृत का भोग करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं, फिर परलोक कैसे?
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.31 का अर्थ क्या है?
हे कुरुश्रेष्ठ, यज्ञ से बचे अमृत का भोग करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं, फिर परलोक कैसे?
भगवद्गीता 4.31 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।