भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 20 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.20 · त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥
tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ |
karmaṇyabhipravṛtto’pi naiva kiṃcitkaroti saḥ ||
हिन्दी अनुवाद
कर्म के फल की आसक्ति छोड़कर, सदा तृप्त और किसी सहारे पर निर्भर न रहने वाला व्यक्ति कर्म में पूरी तरह लगा रहकर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.20 का अर्थ क्या है?
कर्म के फल की आसक्ति छोड़कर, सदा तृप्त और किसी सहारे पर निर्भर न रहने वाला व्यक्ति कर्म में पूरी तरह लगा रहकर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
भगवद्गीता 4.20 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।