भगवद्गीता · अध्याय 3 / 18

कर्मयोग — कर्म योग — कर्म का योग

43 श्लोक

अध्याय का सार

कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कृष्ण समझाते हैं कि आसक्ति छोड़कर, यज्ञ-भाव से और लोकसंग्रह के लिए किया गया कर्म बंधन नहीं बनता, और काम (इच्छा) को ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताते हैं।

सभी 43 श्लोक

  1. 3.1 · अर्जुन

    ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
    तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥

    jyāyasī cetkarmaṇaste matā buddhirjanārdana |
    tatkiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava ||

    अर्जुन बोले: हे जनार्दन, यदि आप कर्म से बुद्धि (ज्ञान) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो हे केशव, मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगा रहे हैं?

  2. 3.2 · अर्जुन

    व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
    तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥

    vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṃ mohayasīva me |
    tadekaṃ vada niścitya yena śreyo’hamāpnuyām ||

    आप दो ओर इशारा करती-सी बातों से मेरी बुद्धि को उलझा रहे हैं। निश्चित करके वह एक बात बताइए जिससे मैं परम कल्याण पा सकूँ।

  3. 3.3 · श्रीकृष्ण

    लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
    ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥

    loke’smindvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha |
    jñānayogena sāṃkhyānāṃ karmayogena yoginām ||

    श्रीभगवान बोले: हे निष्पाप, इस संसार में मैंने पहले से दो प्रकार की निष्ठा बताई है — चिंतनशील लोगों के लिए ज्ञानयोग (सांख्य) और कर्मशील लोगों के लिए कर्मयोग।

  4. 3.4 · श्रीकृष्ण

    न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
    न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥

    na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṃ puruṣo’śnute |
    na ca saṃnyasanādeva siddhiṃ samadhigacchati ||

    कर्मों का आरंभ न करने से मनुष्य कर्म से मुक्ति (निष्कर्मता) नहीं पाता, और केवल संन्यास ले लेने से भी सिद्धि नहीं मिलती।

  5. 3.5 · श्रीकृष्ण

    न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
    कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

    na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt |
    kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ ||

    कोई भी क्षण भर के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; प्रकृति से उत्पन्न गुण हर किसी को, चाहे वह चाहे या न चाहे, कर्म करने को विवश करते हैं।

  6. 3.6 · श्रीकृष्ण

    कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
    इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

    karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran |
    indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate ||

    जो कर्मेन्द्रियों को रोककर बैठ जाता है, पर मन ही मन इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मूढ़ है और पाखंडी कहलाता है।

  7. 3.7 · श्रीकृष्ण

    यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
    कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

    yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate’rjuna |
    karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate ||

    पर हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति के बिना कर्मेन्द्रियों को कर्मयोग में लगाता है, वही श्रेष्ठ है।

  8. 3.8 · श्रीकृष्ण

    नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
    शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

    niyataṃ kuru karma tvaṃ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ |
    śarīrayātrāpi ca te na prasiddhyedakarmaṇaḥ ||

    तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। बिना कर्म के तो तुम्हारे शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।

  9. 3.9 · श्रीकृष्ण

    यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
    तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥

    yajñārthātkarmaṇo’nyatra loko’yaṃ karmabandhanaḥ |
    tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācara ||

    यज्ञ के लिए किए गए कर्म के सिवा बाकी कर्मों से यह संसार बँधता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति छोड़कर उसी उद्देश्य से कर्म करो।

  10. 3.10 · श्रीकृष्ण

    सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
    अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥

    sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥ |
    anena prasaviṣyadhvameṣa vo’stviṣṭakāmadhuk ||

    सृष्टि के आरंभ में प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा की रचना की और कहा कि इसके द्वारा तुम फलो-फूलो; यह यज्ञ तुम्हारी मनचाही वस्तुएँ देने वाली कामधेनु बने।

  11. 3.11 · श्रीकृष्ण

    देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
    परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥

    devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ |
    parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ||

    इससे तुम देवताओं को पुष्ट करो और देवता तुम्हें पुष्ट करें। इस प्रकार एक-दूसरे को पुष्ट करते हुए तुम परम कल्याण पाओगे।

  12. 3.12 · श्रीकृष्ण

    इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
    तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥

    iṣṭānbhogānhi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ |
    tairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ ||

    यज्ञ से संतुष्ट होकर देवता तुम्हें मनचाहे भोग देंगे। जो उनके दिए हुए भोगों को उन्हें अर्पित किए बिना स्वयं भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।

  13. 3.13 · श्रीकृष्ण

    यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
    भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

    yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ |
    bhuñjate te tvaghaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt ||

    यज्ञ से बचा हुआ अन्न खाने वाले सज्जन सब पापों से छूट जाते हैं; पर जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।

  14. 3.14 · श्रीकृष्ण

    अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
    यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥

    annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ |
    yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ||

    सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।

  15. 3.15 · श्रीकृष्ण

    कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
    तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥

    karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam |
    tasmātsarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam ||

    जानो कि कर्म ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न होता है और ब्रह्म अविनाशी परमात्मा से प्रकट हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।

  16. 3.16 · श्रीकृष्ण

    एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
    अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥

    evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ |
    aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati ||

    हे पार्थ, जो इस संसार में इस प्रकार घूमते चक्र के अनुसार नहीं चलता, जो इन्द्रियों के सुख में रमा हुआ पापमय जीवन जीता है, वह व्यर्थ ही जीता है।

  17. 3.17 · श्रीकृष्ण

    यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
    आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥

    yastvātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ |
    ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṃ na vidyate ||

    पर जो मनुष्य आत्मा में ही रमता है, आत्मा से ही तृप्त है और आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

  18. 3.18 · श्रीकृष्ण

    नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
    न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥

    naiva tasya kṛtenārtho nākṛteneha kaścana |
    na cāsya sarvabhūteṣu kaścidarthavyapāśrayaḥ ||

    ऐसे व्यक्ति का इस संसार में न कर्म करने से कोई प्रयोजन है, न कर्म न करने से; और किसी भी प्राणी पर उसका कोई स्वार्थ टिका नहीं होता।

  19. 3.19 · श्रीकृष्ण

    तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
    असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

    tasmādasaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara |
    asakto hyācarankarma paramāpnoti pūruṣaḥ ||

    इसलिए आसक्ति के बिना सदा अपना कर्तव्य कर्म करते रहो; क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करने वाला मनुष्य परम को प्राप्त होता है।

  20. 3.20 · श्रीकृष्ण

    कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
    लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥

    karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥ |
    lokasaṃgrahamevāpi saṃpaśyankartumarhasi ||

    जनक जैसे लोगों ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि पाई थी। लोकसंग्रह (संसार की भलाई और व्यवस्था) को ध्यान में रखकर भी तुम्हें कर्म करना ही चाहिए।

  21. 3.21 · श्रीकृष्ण

    यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
    स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

    yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ |
    sa yatpramāṇaṃ kurute lokastadanuvartate ||

    श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो मानदंड स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।

  22. 3.22 · श्रीकृष्ण

    न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
    नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥

    na me pārthāsti kartavyaṃ triṣu lokeṣu kiṃcana |
    nānavāptamavāptavyaṃ varta eva ca karmaṇi ||

    हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं है, और न कोई ऐसी वस्तु है जो मुझे प्राप्त न हो या जिसे पाना बाकी हो; फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।

  23. 3.23 · श्रीकृष्ण

    यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
    मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

    yadi hyahaṃ na varteyaṃ jātu karmaṇyatandritaḥ |
    mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||

    हे पार्थ, यदि मैं कभी सावधान होकर कर्म में न लगूँ, तो मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग पर चलने लगेंगे।

  24. 3.24 · श्रीकृष्ण

    उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
    संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥

    utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham |
    saṃkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ ||

    यदि मैं कर्म न करूँ तो ये लोक नष्ट हो जाएँ; मैं अव्यवस्था (वर्णसंकर) का कारण बनूँ और इस प्रजा का नाश करने वाला ठहरूँ।

  25. 3.25 · श्रीकृष्ण

    सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
    कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥

    saktāḥ karmaṇyavidvāṃso yathā kurvanti bhārata |
    kuryādvidvāṃstathāsaktaścikīrṣurlokasaṃgraham ||

    हे भारत, जैसे अज्ञानी लोग आसक्त होकर कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को लोकसंग्रह की इच्छा से अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए।

  26. 3.26 · श्रीकृष्ण

    न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
    जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥

    na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām |
    joṣayetsarvakarmāṇi vidvānyuktaḥ samācaran ||

    ज्ञानी को चाहिए कि कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करे; बल्कि स्वयं योग में स्थित होकर सब कर्म भली-भाँति करते हुए उन्हें भी कर्म में लगाए रखे।

  27. 3.27 · श्रीकृष्ण

    प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
    अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

    prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ |
    ahaṃkāravimūḍhātmā kartāhamiti manyate ||

    सब कर्म हर प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं; पर अहंकार से मोहित मनुष्य सोचता है, “मैं कर्ता हूँ।”

  28. 3.28 · श्रीकृष्ण

    तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
    गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥

    tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ |
    guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate ||

    पर हे महाबाहो, जो गुणों और कर्मों के अलग-अलग विभाग का तत्त्व जानता है, वह समझता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, और इसलिए आसक्त नहीं होता।

  29. 3.29 · श्रीकृष्ण

    प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
    तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥

    prakṛterguṇasaṃmūḍhāḥ sajjante guṇakarmasu |
    tānakṛtsnavido mandānkṛtsnavinna vicālayet ||

    प्रकृति के गुणों से मोहित लोग गुणों के कर्मों में आसक्त रहते हैं। पूरा सत्य जानने वाला ज्ञानी उन अधूरी समझ वाले मंदबुद्धि लोगों को विचलित न करे।

  30. 3.30 · श्रीकृष्ण

    मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
    निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥

    mayi sarvāṇi karmāṇi saṃnyasyādhyātmacetasā |
    nirāśīrnirmamo bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ ||

    अपने सारे कर्म मुझे अर्पित करके, चित्त को आत्मा में लगाकर, आशा और ममता से रहित होकर, मन का संताप छोड़कर युद्ध करो।

  31. 3.31 · श्रीकृष्ण

    ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
    श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥

    ye me matamidaṃ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ |
    śraddhāvanto’nasūyanto mucyante te’pi karmabhiḥ ||

    जो मनुष्य श्रद्धा के साथ, दोष-दृष्टि छोड़कर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से छूट जाते हैं।

  32. 3.32 · श्रीकृष्ण

    ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
    सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥

    ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam |
    sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ ||

    पर जो दोष निकालते हुए मेरे इस मत का पालन नहीं करते, उन्हें सारे ज्ञान के विषय में भ्रमित, विवेकहीन और नष्ट हुआ समझो।

  33. 3.33 · श्रीकृष्ण

    सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
    प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥

    sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛterjñānavānapi |
    prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati ||

    ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति के पीछे चलते हैं; केवल दबाने से क्या होगा?

  34. 3.34 · श्रीकृष्ण

    इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
    तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥

    indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau |
    tayorna vaśamāgacchettau hyasya paripanthinau ||

    हर इन्द्रिय के अपने विषय में राग और द्वेष छिपे बैठे हैं। मनुष्य इनके वश में न आए, क्योंकि ये उसकी राह के लुटेरे हैं।

  35. 3.35 · श्रीकृष्ण

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
    स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

    śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt |
    svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥ ||

    भली-भाँति निभाए गए दूसरे के धर्म से अपना धर्म श्रेष्ठ है, भले ही उसमें कमियाँ हों। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है; दूसरे का धर्म भय से भरा है।

  36. 3.36 · अर्जुन

    अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
    अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥

    atha kena prayukto’yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ |
    anicchannapi vārṣṇeya balādiva niyojitaḥ ||

    अर्जुन बोले: हे वार्ष्णेय, तो फिर मनुष्य न चाहते हुए भी किसकी प्रेरणा से पाप करता है, मानो कोई उसे बलपूर्वक उसमें धकेल रहा हो?

  37. 3.37 · श्रीकृष्ण

    काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
    महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

    kāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ |
    mahāśano mahāpāpmā viddhyenamiha vairiṇam ||

    श्रीभगवान बोले: यह काम है, यही क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न होता है। यह कभी तृप्त न होने वाला और महापापी है। इस संसार में इसी को शत्रु जानो।

  38. 3.38 · श्रीकृष्ण

    धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
    यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥

    dhūmenāvriyate vahniryathādarśo malena ca |
    yatholbenāvṛto garbhastathā tenedamāvṛtam ||

    जैसे धुएँ से आग ढकी रहती है, धूल से दर्पण, और झिल्ली से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही यह ज्ञान इस काम से ढका रहता है।

  39. 3.39 · श्रीकृष्ण

    आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
    कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥

    āvṛtaṃ jñānametena jñānino nityavairiṇā |
    kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca ||

    हे कुन्तीपुत्र, ज्ञानी के इस नित्य शत्रु ने, आग की तरह कभी तृप्त न होने वाले इस काम ने, ज्ञान को ढक रखा है।

  40. 3.40 · श्रीकृष्ण

    इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
    एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥

    indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate |
    etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam ||

    इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवास-स्थान कहे जाते हैं। इन्हीं के द्वारा यह ज्ञान को ढककर देहधारी को मोहित कर देता है।

  41. 3.41 · श्रीकृष्ण

    तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
    पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥

    tasmāttvamindriyāṇyādau niyamya bharatarṣabha |
    pāpmānaṃ prajahi hyenaṃ jñānavijñānanāśanam ||

    इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, पहले इन्द्रियों को वश में करो और ज्ञान तथा विज्ञान (अनुभव) का नाश करने वाले इस पापी को निश्चय ही मार डालो।

  42. 3.42 · श्रीकृष्ण

    इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
    मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥

    indriyāṇi parāṇyāhurindriyebhyaḥ paraṃ manaḥ |
    manasastu parā buddhiryo buddheḥ paratastu saḥ ||

    इन्द्रियों को ऊँचा कहा जाता है; इन्द्रियों से ऊँचा मन है, मन से ऊँची बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मा है।

  43. 3.43 · श्रीकृष्ण

    एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
    जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥

    evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānamātmanā |
    jahi śatruṃ mahābāho kāmarūpaṃ durāsadam ||

    हे महाबाहो, इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर, स्वयं से स्वयं को स्थिर करके, काम के रूप में बैठे इस दुर्जय शत्रु को मार डालो।

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