भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.7 · यस्त्विन्द्रियाणि मनसा

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate’rjuna |
karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate ||

हिन्दी अनुवाद

पर हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति के बिना कर्मेन्द्रियों को कर्मयोग में लगाता है, वही श्रेष्ठ है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.7 का अर्थ क्या है?

पर हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति के बिना कर्मेन्द्रियों को कर्मयोग में लगाता है, वही श्रेष्ठ है।

भगवद्गीता 3.7 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।