भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 33 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.33 · सदृशं चेष्टते स्वस्याः

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥

sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛterjñānavānapi |
prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati ||

हिन्दी अनुवाद

ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति के पीछे चलते हैं; केवल दबाने से क्या होगा?

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.33 का अर्थ क्या है?

ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति के पीछे चलते हैं; केवल दबाने से क्या होगा?

भगवद्गीता 3.33 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।