भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 34 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.34 · इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥

indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau |
tayorna vaśamāgacchettau hyasya paripanthinau ||

हिन्दी अनुवाद

हर इन्द्रिय के अपने विषय में राग और द्वेष छिपे बैठे हैं। मनुष्य इनके वश में न आए, क्योंकि ये उसकी राह के लुटेरे हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.34 का अर्थ क्या है?

हर इन्द्रिय के अपने विषय में राग और द्वेष छिपे बैठे हैं। मनुष्य इनके वश में न आए, क्योंकि ये उसकी राह के लुटेरे हैं।

भगवद्गीता 3.34 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।