भगवद्गीता · अध्याय 2 / 18
साङ्ख्ययोग — सांख्य योग — ज्ञान का योग
72 श्लोक
अध्याय का सार
अर्जुन कृष्ण की शरण लेते हैं और कृष्ण उपदेश आरंभ करते हैं: आत्मा अजर-अमर है, शरीर नश्वर है। फिर वे कर्मयोग का सूत्र देते हैं — कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं — और स्थितप्रज्ञ, अर्थात् स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के लक्षण बताते हैं।
सभी 72 श्लोक
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2.1 · संजय
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥taṃ tathā kṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam |
viṣīdantamidaṃ vākyamuvāca madhusūdanaḥ ||संजय बोले: करुणा से घिरे, आँसुओं से भरी व्याकुल आँखों वाले और विषाद में डूबे अर्जुन से मधुसूदन (कृष्ण) ने ये वचन कहे।
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2.2 · श्रीकृष्ण
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥kutastvā kaśmalamidaṃ viṣame samupasthitam |
anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna ||श्रीभगवान बोले: हे अर्जुन, संकट की इस घड़ी में यह मोह तुम्हें कहाँ से आ घेरा? यह श्रेष्ठ पुरुषों को शोभा नहीं देता; यह न स्वर्ग दिलाता है, न कीर्ति।
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2.3 · श्रीकृष्ण
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate |
kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa ||हे पार्थ, इस कायरता के वश में मत हो; यह तुम्हारे योग्य नहीं है। हे परन्तप, हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को झटककर उठ खड़े हो।
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2.4 · अर्जुन
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥kathaṃ bhīṣmamahaṃ saṃkhye droṇaṃ ca madhusūdana |
iṣubhiḥ prati yotsyāmi pūjārhāvarisūdana ||अर्जुन बोले: हे मधुसूदन, हे शत्रुओं का संहार करने वाले, मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण पर बाण कैसे चलाऊँ? वे तो मेरे लिए पूजनीय हैं।
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2.5 · अर्जुन
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke |
hatvārthakāmāṃstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān ||इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से तो इस संसार में भीख माँगकर जीना भी अच्छा है। धन के लोभी होने पर भी ये गुरु ही हैं; इन्हें मारकर मैं यहीं रक्त से सने भोग ही तो भोगूँगा।
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2.6 · अर्जुन
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥na caitadvidmaḥ kataranno garīyo yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ |
yāneva hatvā na jijīviṣāma- ste’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ ||हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है — हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीना भी न चाहें, वही धृतराष्ट्र के पुत्र सामने खड़े हैं।
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2.7 · अर्जुन
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharmasammūḍhacetāḥ |
yacchreyaḥ syānniścitaṃ brūhi tanme śiṣyaste’haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam ||दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है और धर्म के विषय में मेरी बुद्धि उलझ गई है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ — जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ; मुझे राह दिखाइए।
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2.8 · अर्जुन
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥na hi prapaśyāmi mamāpanudyād yacchokamucchoṣaṇamindriyāṇām |
avāpya bhūmāvasapatnamṛddhaṃ rājyaṃ surāṇāmapi cādhipatyam ||पृथ्वी पर निष्कंटक और समृद्ध राज्य, या देवताओं पर प्रभुत्व पाकर भी मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो इन्द्रियों को सुखा देने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके।
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2.9 · संजय
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥evamuktvā hṛṣīkeśaṃ guḍākeśaḥ parantapa |
na yotsya iti govindamuktvā tūṣṇīṃ babhūva ha ||संजय बोले: हे राजन, शत्रुओं को तपाने वाले गुडाकेश (अर्जुन) ने हृषीकेश से ऐसा कहा, फिर गोविन्द से “मैं युद्ध नहीं करूँगा” कहकर चुप हो गए।
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2.10 · संजय
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥tamuvāca hṛṣīkeśaḥ prahasanniva bhārata |
senayorubhayormadhye viṣīdantamidaṃ vacaḥ ||हे भारत, तब दोनों सेनाओं के बीच शोक में डूबे अर्जुन से हृषीकेश ने मानो मुस्कुराते हुए ये वचन कहे।
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2.11 · श्रीकृष्ण
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase |
gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ ||श्रीभगवान बोले: तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं, और फिर भी ज्ञानियों जैसी बातें करते हो। ज्ञानी न मरे हुओं के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए।
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2.12 · श्रीकृष्ण
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥na tvevāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ |
na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param ||ऐसा कभी नहीं था कि मैं न रहा हूँ, या तुम न रहे हो, या ये राजा न रहे हों; और न ऐसा होगा कि आगे चलकर हम सब न रहें।
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2.13 · श्रीकृष्ण
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥dehino’sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā |
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati ||जैसे देहधारी आत्मा इसी शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुज़रता है, वैसे ही वह दूसरा शरीर पाता है। धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
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2.14 · श्रीकृष्ण
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ |
āgamāpāyino’nityāstāṃstitikṣasva bhārata ||हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों का अपने विषयों से संपर्क ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देता है। ये आते-जाते रहते हैं, टिकते नहीं; हे भारत, इन्हें धैर्य से सहो।
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2.15 · श्रीकृष्ण
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha |
samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so’mṛtatvāya kalpate ||हे पुरुषश्रेष्ठ, जिस धीर व्यक्ति को ये विचलित नहीं करते, जो सुख और दुःख में एक-सा रहता है, वही अमरता के योग्य होता है।
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2.16 · श्रीकृष्ण
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ |
ubhayorapi dṛṣṭo’ntastvanayostattvadarśibhiḥ ||असत् का कभी अस्तित्व नहीं होता और सत् का कभी अभाव नहीं होता। तत्त्व को देखने वालों ने इन दोनों का अंतिम स्वरूप जान लिया है।
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2.17 · श्रीकृष्ण
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṃ tatam |
vināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati ||जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। उस अविनाशी का विनाश कोई नहीं कर सकता।
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2.18 · श्रीकृष्ण
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ |
anāśino’prameyasya tasmādyudhyasva bhārata ||नित्य, अविनाशी और अपरिमेय देहधारी आत्मा के ये शरीर नश्वर कहे गए हैं। इसलिए हे भारत, युद्ध करो।
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2.19 · श्रीकृष्ण
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ya enaṃ vetti hantāraṃ yaścainaṃ manyate hatam |
ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate ||जो आत्मा को मारने वाला समझता है और जो उसे मारा गया मानता है — दोनों ही सत्य नहीं जानते। आत्मा न मारता है, न मारा जाता है।
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2.20 · श्रीकृष्ण
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥na jāyate mriyate vā kadācin
nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ |
ajo nityaḥ śāśvato’yaṃ purāṇo
na hanyate hanyamāne śarīre ||आत्मा न कभी जन्म लेता है, न कभी मरता है; ऐसा नहीं कि वह एक बार होकर फिर न रहे। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारा जाता।
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2.21 · श्रीकृष्ण
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enamajamavyayam |
kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam ||हे पार्थ, जो इसे अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसे और कैसे मरवा सकता है, या किसे मार सकता है?
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2.22 · श्रीकृष्ण
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya
navāni gṛhṇāti naro’parāṇi |
tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇā-
nyanyāni saṃyāti navāni dehī ||जैसे मनुष्य पुराने कपड़े उतारकर नए कपड़े पहन लेता है, वैसे ही देहधारी आत्मा जर्जर शरीरों को छोड़कर नए शरीरों में चला जाता है।
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2.23 · श्रीकृष्ण
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥nainaṃ chindanti śastrāṇi nainaṃ dahati pāvakaḥ |
na cainaṃ kledayantyāpo na śoṣayati mārutaḥ ||इसे शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
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2.24 · श्रीकृष्ण
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥acchedyo’yamadāhyo’yamakledyo’śoṣya eva ca |
nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo’yaṃ sanātanaḥ ||यह काटा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, भिगोया या सुखाया नहीं जा सकता। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
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2.25 · श्रीकृष्ण
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥avyakto’yamacintyo’yamavikāryo’yamucyate |
tasmādevaṃ viditvainaṃ nānuśocitumarhasi ||यह आत्मा अव्यक्त है, मन से सोचा नहीं जा सकता और हर विकार से परे है। इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
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2.26 · श्रीकृष्ण
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥atha cainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam |
tathāpi tvaṃ mahābāho naivaṃ śocitumarhasi ||और यदि तुम इसे बार-बार जन्म लेने वाला और बार-बार मरने वाला भी मानो, तब भी हे महाबाहो, तुम्हें इसके लिए शोक करना उचित नहीं।
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2.27 · श्रीकृष्ण
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṃ janma mṛtasya ca |
tasmādaparihārye’rthe na tvaṃ śocitumarhasi ||क्योंकि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है। इसलिए जो टल नहीं सकता, उसके लिए शोक मत करो।
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2.28 · श्रीकृष्ण
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata |
avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā ||हे भारत, सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे, बीच में प्रकट होते हैं और मृत्यु के बाद फिर अप्रकट हो जाते हैं। इसमें विलाप की क्या बात है?
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2.29 · श्रीकृष्ण
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥āścaryavatpaśyati kaścidenamāścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ |
āścaryavaccainamanyaḥ śṛṇoti śrutvāpyenaṃ veda na caiva kaścit ||कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह इसका वर्णन करता है, कोई आश्चर्य की तरह इसके बारे में सुनता है; और सुनकर भी कोई इसे नहीं जान पाता।
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2.30 · श्रीकृष्ण
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥dehī nityamavadhyo’yaṃ dehe sarvasya bhārata |
tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitumarhasi ||हे भारत, सबके शरीर में रहने वाला यह आत्मा सदा अवध्य है। इसलिए किसी भी प्राणी के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
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2.31 · श्रीकृष्ण
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi |
dharmyāddhi yuddhācchreyo’nyatkṣatriyasya na vidyate ||अपने धर्म को देखते हुए भी तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी और कुछ नहीं है।
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2.32 · श्रीकृष्ण
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥yadṛcchayā copapannaṃ svargadvāramapāvṛtam |
sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddhamīdṛśam ||हे पार्थ, अपने-आप सामने आया ऐसा युद्ध मानो स्वर्ग का खुला द्वार है; भाग्यशाली क्षत्रिय ही ऐसा युद्ध पाते हैं।
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2.33 · श्रीकृष्ण
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥atha cettvamimaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi |
tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpamavāpsyasi ||पर यदि तुम यह धर्मयुक्त युद्ध नहीं करोगे, तो अपना धर्म और कीर्ति खोकर पाप के भागी बनोगे।
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2.34 · श्रीकृष्ण
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥akīrtiṃ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te’vyayām |
sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate ||लोग सदा तुम्हारे अपयश की चर्चा करेंगे; और सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर है।
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2.35 · श्रीकृष्ण
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥bhayādraṇāduparataṃ maṃsyante tvāṃ mahārathāḥ |
yeṣāṃ ca tvaṃ bahumato bhūtvā yāsyasi lāghavam ||महारथी समझेंगे कि तुम डर के मारे युद्ध से हट गए। जिनकी दृष्टि में तुम बहुत ऊँचे थे, उन्हीं की नज़रों में तुम छोटे हो जाओगे।
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2.36 · श्रीकृष्ण
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥avācyavādāṃśca bahūnvadiṣyanti tavāhitāḥ |
nindantastava sāmarthyaṃ tato duḥkhataraṃ nu kim ||तुम्हारे शत्रु तुम्हारी सामर्थ्य की निंदा करते हुए बहुत-सी न कहने योग्य बातें कहेंगे। इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?
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2.37 · श्रीकृष्ण
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥hato vā prāpsyasi svargaṃ jitvā vā bhokṣyase mahīm |
tasmāduttiṣṭha kaunteya yuddhāya kṛtaniścayaḥ ||यदि मारे गए तो स्वर्ग पाओगे, और जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, युद्ध का निश्चय करके उठो।
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2.38 · श्रीकृष्ण
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau |
tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpamavāpsyasi ||सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
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2.39 · श्रीकृष्ण
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥eṣā te’bhihitā sāṃkhye buddhiryoge tvimāṃ śṛṇu |
buddhyā yukto yayā pārtha karmabandhaṃ prahāsyasi ||यह बुद्धि तुम्हें सांख्य के अनुसार बताई गई। अब इसे योग के अनुसार सुनो; हे पार्थ, इस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्म के बंधन को तोड़ दोगे।
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2.40 · श्रीकृष्ण
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥nehābhikramanāśo’sti pratyavāyo na vidyate |
svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||इस मार्ग में किया गया आरंभ कभी व्यर्थ नहीं जाता और इसमें उलटा परिणाम भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से बचा लेता है।
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2.41 · श्रीकृष्ण
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥vyavasāyātmikā buddhirekeha kurunandana |
bahuśākhā hyanantāśca buddhayo’vyavasāyinām ||हे कुरुनन्दन, इस मार्ग में निश्चय वाली बुद्धि एक ही होती है; पर जिनकी बुद्धि अनिश्चित है, उनके विचार अनगिनत शाखाओं में बँटे रहते हैं।
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2.42 · श्रीकृष्ण
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥yāmimāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadantyavipaścitaḥ |
vedavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ ||हे पार्थ, कुछ अविवेकी लोग वेद के शब्दों में ही रमे रहते हैं और कहते हैं कि इसके सिवा कुछ है ही नहीं। वे फूलों-सी लुभावनी वाणी बोलते हैं —
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2.43 · श्रीकृष्ण
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām |
kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati ||— उनका मन कामनाओं से भरा है और स्वर्ग ही उनका परम लक्ष्य है। उनकी वह वाणी कर्मों के फल के रूप में नया जन्म देने वाली है और भोग तथा ऐश्वर्य पाने के लिए तरह-तरह के कर्मकाण्डों से भरी है —
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2.44 · श्रीकृष्ण
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām |
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||— भोग और ऐश्वर्य में आसक्त, उस वाणी से जिनका मन हर लिया गया है, ऐसे लोगों की निश्चयात्मक बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं हो पाती।
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2.45 · श्रीकृष्ण
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna |
nirdvandvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavān ||वेद तीन गुणों के क्षेत्र की बातें करते हैं; हे अर्जुन, तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो। द्वन्द्वों से मुक्त, सदा सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, पाने और सहेजने की चिंता से रहित होकर आत्मा में टिके रहो।
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2.46 · श्रीकृष्ण
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥yāvānartha udapāne sarvataḥ saṃplutodake |
tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ ||जहाँ चारों ओर जल ही जल हो, वहाँ एक छोटे कुएँ का जितना प्रयोजन रह जाता है, तत्त्व को जान लेने वाले ब्राह्मण के लिए सारे वेदों का उतना ही प्रयोजन है।
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2.47 · श्रीकृष्ण
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana |
mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo’stvakarmaṇi ||तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों पर कभी नहीं। कर्म के फल को अपना प्रेरक मत बनाओ, और कर्म न करने से भी तुम्हारा लगाव न हो।
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2.48 · श्रीकृष्ण
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya |
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||हे धनञ्जय, आसक्ति छोड़कर, सफलता और असफलता में समान रहते हुए, योग में स्थित होकर कर्म करो। यही समता योग कहलाती है।
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2.49 · श्रीकृष्ण
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥dūreṇa hyavaraṃ karma buddhiyogāddhanaṃjaya |
buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ ||हे धनञ्जय, बुद्धियोग की तुलना में केवल कर्म बहुत नीचा है। इसलिए बुद्धि की शरण लो; फल के लिए कर्म करने वाले दया के पात्र हैं।
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2.50 · श्रीकृष्ण
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte |
tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||समबुद्धि से युक्त व्यक्ति इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों को पीछे छोड़ देता है। इसलिए योग में लग जाओ; कर्मों में कुशलता ही योग है।
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2.51 · श्रीकृष्ण
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥karmajaṃ buddhiyuktā hi phalaṃ tyaktvā manīṣiṇaḥ |
janmabandhavinirmuktāḥ padaṃ gacchantyanāmayam ||समबुद्धि से युक्त ज्ञानी कर्म से पैदा होने वाले फल को त्यागकर जन्म के बंधन से छूट जाते हैं और उस पद को पाते हैं जहाँ कोई दुःख नहीं।
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2.52 · श्रीकृष्ण
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥yadā te mohakalilaṃ buddhirvyatitariṣyati |
tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya ca ||जब तुम्हारी बुद्धि मोह के इस दलदल को पार कर लेगी, तब तुम जो सुन चुके हो और जो सुनना बाकी है, उन दोनों से उदासीन हो जाओगे।
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2.53 · श्रीकृष्ण
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā |
samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasi ||तरह-तरह की श्रुतियों को सुनकर भटकी हुई तुम्हारी बुद्धि जब समाधि में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त कर लोगे।
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2.54 · अर्जुन
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava |
sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim ||अर्जुन बोले: हे केशव, जिसकी प्रज्ञा स्थिर है और जो समाधि में स्थित है, उसकी क्या पहचान है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
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2.55 · श्रीकृष्ण
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān |
ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate ||श्रीभगवान बोले: हे पार्थ, जब मनुष्य मन में उठने वाली सारी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा के द्वारा आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
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2.56 · श्रीकृष्ण
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ |
vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate ||जिसका मन दुःख में विचलित नहीं होता, जिसे सुख की लालसा नहीं रहती, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहलाता है।
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2.57 · श्रीकृष्ण
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham |
nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||जो कहीं भी आसक्त नहीं है, जो शुभ मिलने पर हर्षित नहीं होता और अशुभ मिलने पर द्वेष नहीं करता, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
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2.58 · श्रीकृष्ण
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo’ṅgānīva sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ||जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब कोई अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।
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2.59 · श्रीकृष्ण
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ |
rasavarjaṃ raso’pyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartate ||आहार छोड़ देने वाले देहधारी से विषय तो दूर हो जाते हैं, पर उनका रस (लालसा) नहीं जाता। परम तत्त्व का दर्शन हो जाने पर वह रस भी छूट जाता है।
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2.60 · श्रीकृष्ण
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ |
indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ ||हे कुन्तीपुत्र, प्रयत्न करने वाले विवेकी पुरुष के मन को भी ये उद्दंड इन्द्रियाँ बलपूर्वक खींच ले जाती हैं।
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2.61 · श्रीकृष्ण
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥tāni sarvāṇi saṃyamya yukta āsīta matparaḥ |
vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||उन सब इन्द्रियों को वश में करके, मुझमें मन लगाकर, संयम से बैठे। जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
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2.62 · श्रीकृष्ण
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥dhyāyato viṣayānpuṃsaḥ saṅgasteṣūpajāyate |
saṅgātsañjāyate kāmaḥ kāmātkrodho’bhijāyate ||विषयों का चिंतन करते रहने से मनुष्य को उनसे लगाव हो जाता है; लगाव से कामना पैदा होती है, और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
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2.63 · श्रीकृष्ण
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥krodhādbhavati sammohaḥ sammohātsmṛtivibhramaḥ |
smṛtibhraṃśād buddhināśo buddhināśātpraṇaśyati ||क्रोध से मूढ़ता आती है, मूढ़ता से स्मृति डगमगा जाती है, स्मृति के भ्रम से बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि के नष्ट होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।
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2.64 · श्रीकृष्ण
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥rāgadveṣaviyuktaistu viṣayānindriyaiścaran |
ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati ||पर जो आत्मसंयमी व्यक्ति राग और द्वेष से मुक्त, अपने वश में रखी इन्द्रियों से विषयों के बीच विचरता है, वह मन की निर्मल प्रसन्नता पाता है।
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2.65 · श्रीकृष्ण
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānirasyopajāyate |
prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate ||उस प्रसन्नता में उसके सारे दुःख मिट जाते हैं, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
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2.66 · श्रीकृष्ण
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā |
na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham ||जो योग से युक्त नहीं, उसमें स्थिर बुद्धि नहीं होती और न ही भावना (ध्यान) होती है। बिना ध्यान के शांति नहीं, और शांति के बिना सुख कहाँ?
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2.67 · श्रीकृष्ण
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥indriyāṇāṃ hi caratāṃ yanmano’nu vidhīyate |
tadasya harati prajñāṃ vāyurnāvamivāmbhasi ||जैसे हवा पानी में नाव को बहा ले जाती है, वैसे ही विषयों में भटकती इन्द्रियों में से जिस एक के पीछे मन चल पड़ता है, वही उसकी बुद्धि को हर ले जाती है।
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2.68 · श्रीकृष्ण
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥tasmādyasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ||इसलिए हे महाबाहो, जिसकी इन्द्रियाँ अपने विषयों से हर प्रकार से समेट ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
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2.69 · श्रीकृष्ण
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥yā niśā sarvabhūtānāṃ tasyāṃ jāgarti saṃyamī |
yasyāṃ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyato muneḥ ||जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह तत्त्व को देखने वाले मुनि के लिए रात है।
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2.70 · श्रीकृष्ण
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ samudramāpaḥ praviśanti yadvat |
tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntimāpnoti na kāmakāmī ||जैसे चारों ओर से नदियों का जल आते रहने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा में अचल रहता है, वैसे ही जिसमें सारी कामनाएँ आकर समा जाती हैं, वही शांति पाता है — कामनाओं के पीछे भागने वाला नहीं।
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2.71 · श्रीकृष्ण
विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥vihāya kāmānyaḥ sarvān pumāṃścarati niḥspṛhaḥ |
nirmamo nirahaṃkāraḥ sa śāntimadhigacchati ||जो मनुष्य सारी कामनाओं को त्यागकर, लालसा, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरता है, वही शांति पाता है।
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2.72 · श्रीकृष्ण
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati |
sthitvāsyāmantakāle’pi brahmanirvāṇamṛcchati ||हे पार्थ, यह ब्रह्म में स्थित होने की अवस्था है। इसे पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता। अंतकाल में भी इसमें स्थित रहकर वह ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म की परम शांति) पा लेता है।