भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 64 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.64 · रागद्वेषवियुक्तैस्तु
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥
rāgadveṣaviyuktaistu viṣayānindriyaiścaran |
ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati ||
हिन्दी अनुवाद
पर जो आत्मसंयमी व्यक्ति राग और द्वेष से मुक्त, अपने वश में रखी इन्द्रियों से विषयों के बीच विचरता है, वह मन की निर्मल प्रसन्नता पाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.64 का अर्थ क्या है?
पर जो आत्मसंयमी व्यक्ति राग और द्वेष से मुक्त, अपने वश में रखी इन्द्रियों से विषयों के बीच विचरता है, वह मन की निर्मल प्रसन्नता पाता है।
भगवद्गीता 2.64 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।