भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 2 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.2 · कुतस्त्वा कश्मलमिदं

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥

kutastvā kaśmalamidaṃ viṣame samupasthitam |
anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna ||

हिन्दी अनुवाद

श्रीभगवान बोले: हे अर्जुन, संकट की इस घड़ी में यह मोह तुम्हें कहाँ से आ घेरा? यह श्रेष्ठ पुरुषों को शोभा नहीं देता; यह न स्वर्ग दिलाता है, न कीर्ति।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.2 का अर्थ क्या है?

श्रीभगवान बोले: हे अर्जुन, संकट की इस घड़ी में यह मोह तुम्हें कहाँ से आ घेरा? यह श्रेष्ठ पुरुषों को शोभा नहीं देता; यह न स्वर्ग दिलाता है, न कीर्ति।

भगवद्गीता 2.2 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।