भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 13 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.13 · देहिनोऽस्मिन्यथा देहे
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
dehino’sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā |
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati ||
हिन्दी अनुवाद
जैसे देहधारी आत्मा इसी शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुज़रता है, वैसे ही वह दूसरा शरीर पाता है। धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.13 का अर्थ क्या है?
जैसे देहधारी आत्मा इसी शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुज़रता है, वैसे ही वह दूसरा शरीर पाता है। धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
भगवद्गीता 2.13 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।