भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 14 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.14 · मात्रास्पर्शास्तु
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ |
āgamāpāyino’nityāstāṃstitikṣasva bhārata ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों का अपने विषयों से संपर्क ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देता है। ये आते-जाते रहते हैं, टिकते नहीं; हे भारत, इन्हें धैर्य से सहो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.14 का अर्थ क्या है?
हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों का अपने विषयों से संपर्क ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देता है। ये आते-जाते रहते हैं, टिकते नहीं; हे भारत, इन्हें धैर्य से सहो।
भगवद्गीता 2.14 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।