भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 7 · अर्जुन

भगवद्गीता 2.7 · कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥

kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharmasammūḍhacetāḥ |
yacchreyaḥ syānniścitaṃ brūhi tanme śiṣyaste’haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam ||

हिन्दी अनुवाद

दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है और धर्म के विषय में मेरी बुद्धि उलझ गई है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ — जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ; मुझे राह दिखाइए।

प्रसंग

यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.7 का अर्थ क्या है?

दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है और धर्म के विषय में मेरी बुद्धि उलझ गई है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ — जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ; मुझे राह दिखाइए।

भगवद्गीता 2.7 किसने कहा है?

यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।