भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 58 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.58 · यदा संहरते चायं सर्वशः
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo’ṅgānīva sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ||
हिन्दी अनुवाद
जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब कोई अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.58 का अर्थ क्या है?
जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब कोई अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।
भगवद्गीता 2.58 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।