भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.16 · नासतो विद्यते भावो सतः
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ |
ubhayorapi dṛṣṭo’ntastvanayostattvadarśibhiḥ ||
हिन्दी अनुवाद
असत् का कभी अस्तित्व नहीं होता और सत् का कभी अभाव नहीं होता। तत्त्व को देखने वालों ने इन दोनों का अंतिम स्वरूप जान लिया है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.16 का अर्थ क्या है?
असत् का कभी अस्तित्व नहीं होता और सत् का कभी अभाव नहीं होता। तत्त्व को देखने वालों ने इन दोनों का अंतिम स्वरूप जान लिया है।
भगवद्गीता 2.16 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।