भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 68 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.68 · तस्माद्यस्य महाबाहो

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

tasmādyasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ||

हिन्दी अनुवाद

इसलिए हे महाबाहो, जिसकी इन्द्रियाँ अपने विषयों से हर प्रकार से समेट ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.68 का अर्थ क्या है?

इसलिए हे महाबाहो, जिसकी इन्द्रियाँ अपने विषयों से हर प्रकार से समेट ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

भगवद्गीता 2.68 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।