भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 46 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.46 · यावानर्थ उदपाने सर्वतः

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥

yāvānartha udapāne sarvataḥ saṃplutodake |
tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ ||

हिन्दी अनुवाद

जहाँ चारों ओर जल ही जल हो, वहाँ एक छोटे कुएँ का जितना प्रयोजन रह जाता है, तत्त्व को जान लेने वाले ब्राह्मण के लिए सारे वेदों का उतना ही प्रयोजन है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.46 का अर्थ क्या है?

जहाँ चारों ओर जल ही जल हो, वहाँ एक छोटे कुएँ का जितना प्रयोजन रह जाता है, तत्त्व को जान लेने वाले ब्राह्मण के लिए सारे वेदों का उतना ही प्रयोजन है।

भगवद्गीता 2.46 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।